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संस्कृति विभाग
छत्तीसगढ़ शासन
संस्कृति विभाग
वार्षिक प्रशासकीय प्रतिवेदन 2008 - 2009


विभाग का नाम संस्कृति विभाग
मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल
सचिव श्री आर. पी. जैन
अतिरिक्त सचिव श्री बी. के. अग्रवाल
उपसचिव डॉ. तपेश चन्द्र गुप्ता
छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग
अध्यक्ष श्री श्यामलाल चतुर्वेदी
सदस्य डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र
श्री केदार सिंह परिहार
सचिव डॉ. सुरेन्द्र दुबे
विभागाध्यक्ष
संचालक श्री राकेश चतुर्वेदी
संयुक्त संचालक डॉ. तपेश चन्द्र गुप्ता
उप सचालक श्री राहुल सिंह
श्री एस. एस. यादव
श्री जे. आर. भगत
श्री एस. बी. सतपाल
श्री एस. एस. सी. केरकेट्टा

संचालनालय संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग,रायपुर के विभागाध्यक्ष तथा मैदानी कार्यालयों की स्वकृत पद संरचना

क्र. पदनाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा
स्वीकृत पद
भरे पद रिक्त पद
पुरातत्व प्रभाव
1 संचालक(प्रतिनियुक्ति) प्रथम 12000-16500 01 01 -
2 संयुक्त संचालक प्रथम 10000-15200 01 - 01
3 उप संचालक
प्रथम 10000-15200 03 02 01
4 लेखाधिकारी(प्रतिनियुक्ति) द्वितीय 8000-13500 01 01 -
5 मुद्राशास्त्री द्वितीय 8000-13500 01 - 01
6 पुरालेखवेत्ता द्वितीय 8000-13500 01 - 01
7 पुरातत्वीय अधि. द्वितीय 8000-13500 02 - 01
8 पुरातत्ववेत्ता द्वितीय 8000-13500 01 02 -
9 अधीक्षक तृतीय 5500-9000 01 - 01
10 कनि.लेखाधिकारी(प्रतिनि.) तृतीय 5000-8000 01 - 01
11 सहा. अधीक्षक तृतीय 5000-8000 01 - 01
12 सहा. वर्ग-1 तृतीय 4500-7000 03 01 -
13 सहा. वर्ग-2 तृतीय 4000-6000 05 03
14 सहा. वर्ग-3 तृतीय 3050-4590 03 02 03
15 स्टेनोग्राफर- तृतीय 4000-6000 05 02 01
16 स्टेनो टायपिस्ट तृतीय 3050-4590 01 05 -
17 डाटा एंट्री आपरेटर तृतीय 3500-5200 03 01 -
18 वाहन चालक तृतीय 3050-4590 11 03 -
19 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 01 11 -
20 चौकीदार चतुर्थ जिलाध्यक्ष दर 01 - 01
21 अंशकालिक फर्राश चतुर्थ जिलाध्यक्ष दर 01 - 01
22 वीडियोग्राफर/छायाचित्रकार तृतीय 4000-6000 01 01 -
मॉडलिंग खण्ड
1 कलाकार तृतीय 5000-8000 02 02 -
2 सहा. कलाकार तृतीय 4500-7000 02 01 01
3 मोल्डर/सेल्समेन तृतीय 3050-4590 02 02 -
अनुरक्षण शाखा
1 उप संचालक प्रथम 10000-15200 01 01 -
2 सहायक यंत्री द्वितीय 8000-13500 01 - 01प्र. नि.
3 मुख्य रसायनज्ञ द्वितीय 8000-13500 01 - 01
4 उपयंत्री तृतीय 5000-8000 03 03 -
5 मानचित्रकार तृतीय 5000-8000 02 02 -
6 रसायनज्ञ तृतीय 5000-8000 02 01 01
7 सहा. रसायनज्ञ तृतीय 4500-7000 02 02 -
8 उत्खनन सहायक तृतीय 4500-7000 03 03 -
9 पर्यवेक्षक तृतीय 4000-6000 01 01 -
10 सर्वेयर तृतीय 4000-6000 03 03 -
11 सहायक वर्ग-2 तृतीय 4000-6000 03 03 -
12 सहायक वर्ग-3 तृतीय 3050-4590 03 02 01
13 डाटा एंट्री आपरेटर तृतीय 3500-5200 01 01 -
प्रकाशन खण्ड
1 प्रकाशन अधिकारी द्वितीय 800-13500 01 01 -
2 तकनीकी सहायक तृतीय 4500-7000 02 02 -
3 सहायक वर्ग-2 तृतीय 4500-7000 01 01 -
4 सहायक वर्ग-3 तृतीय 3050-4590 01 01
राज्य पुरालेख संचालनालय
1 उप संचालक प्रथम 10000-15200 01 01 -
2 पुरा. अधिकारी द्वितीय 8000-13500 01 - 01
3 संरक्षण अधिकारी द्वितीय 6500-10500 01 - 01
4 सहा. पुरा. अधि. तृतीय
5500-9000 01 - 01
5 सहायक ग्रंथपाल तृतीय
5000-8000 01 01 -
6 सहा. पुरालेखपाल तृतीय
4500-7000 01 01 -
7 सहायक वर्ग-2 तृतीय
4000-6000 01 01 -
8 डाटा एंट्री आपरेटर तृतीय
3500-5200 01 01 -
9 बार्इन्डर तृतीय
3050-4590 01 01 -
10 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 02 02 -
संग्रहालय
1 संग्रहाध्यक्ष द्वितीय 8000-13500 03 - 03
2 मार्गदर्शक/गार्इड तृतीय 3500-5200 03 03 -
3 सहायक ग्रेड-2 तृतीय 4000-6000 07 02 05
4 सहायक ग्रेड-3 तृतीय 3050-4590 07 07 -
5 डाटा एंट्री आपरेटर तृतीय 3500-5200 03 03 -
6 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 07 06 01
7 चौकीदार चतुर्थ 2550-3200 11 02 09
8 केयर टेकर चतुर्थ जिलाधध्यक्ष दर 12 06 06
ग्रंथालय
1 ग्रंथहपाल द्वितीय 8000-13500 01 - 01
2 सहायक ग्रंथपाल तृतीय 5000-8000 01 01 -
3 सहायक प्रोग्रामर तृतीय 5000-8000 01 01 -
4 डाटा एंट्री आपरेटर तृतीय 3500-5200 01 01 -
5 सहायक वर्ग-3 तृतीय 3050-4590 02 02 -
6 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 04 04 -
राजभाषा
1 शोध सहायक तृतीय 5000-8000 02 02 -
2 अनुवादक तृतीय 4500-7000 02 02 -
3 सहायक वर्ग-2 तृतीय 4000-6000 01 01 -
4 सहायक वर्ग-3 तृतीय 4000-6000 03 02 01
5 डाटा एंट्री आपरेटर तृतीय 3500-5200 01 01 -
6 अनुदेशक तृतीय 3500-5200 02 02 -
7 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 02 02 -
गजेटियर
1 संयुक्त संचालक प्रथम 12000-16500 01 01 -
2 उप संचालक प्रथम 10000-15200 01 01 -
3 सहा. संचालक द्वितीय 8000-13500 01 - 01
4 सहायक संचालक द्वितीय 01 01 -

स्वीकृत सांख्येतर पदों की जानकारी

क्र. पद नाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा
स्वीकृत पद
भरे पद रिक्त पद
1 केयर टेकर चतुर्थ 2550-3200 11 11 7
2 स्वीपर चतुर्थ 2550-3200 01 01 -
3 केयर टेकर(नैमित्तिक) चतुर्थ 2550-3200 06 06 -
4 उद्यान रेजा चतुर्थ 2550-3200 04 04 -
5 उद्यान मजदूर चतुर्थ 2550-3200 02 02 -
6 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 - - -

पुरखौती मुक्तांगन, उपरवारा

क्र. पद नाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा
स्वीकृत पद
भरे पद रिक्त पद
1 सहा. उद्यान विकास अधिकारी तृतीय 5000-8000 01 -- 01
2 उप अभियंता तृतीय 5000-8000 01 -- 01
3 स्वागतकर्ता तृतीय 4500-7000 02 02 --

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ, भिलाई

क्र. पद नाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा
स्वीकृत पद
भरे पद रिक्त पद
1 अध्यक्ष प्रथम 10000/-प्र.म. 01 01 -
2 सहायक वर्ग-3 तृतीय 2500/-प्र.म. 01 01 -
3 भृत्य चतुर्थ 2000/-प्र.म. 01 01 -

छत्तीसगढ़ सिंधी साहित्य संस्थान

क्र. पद नाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा
स्वीकृत पद
भरे पद रिक्त पद
1 अध्यक्ष प्रथम 6000/-प्र.म. 01 01 -
2 उपाध्यक्ष प्रथम 5000/-प्र.म. 01 01 -
3 सचिव द्वितीय 8000-13500 01 01 -
4 कार्यकारिणी सदस्य द्वितीय - 06 06 -
5 सलाहकार द्वितीय - 03 03 -
6 कार्यालय सहायक तृतीय 2000/-प्र.म. 01 01 -
7 कम्प्यूटर आपरेटर तृतीय 1500/-प्र.म. 01 01 -
8 लेखा तृतीय 3000/-प्र.व. 01 01 -

छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग

क्र. पद नाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा
स्वीकृत पद
भरे पद रिक्त पद
1 अध्यक्ष प्रथम 25000 प्र.मा. 01 01 00
2 सदस्य प्रथम 18000 प्र.मा. 02 02 00
3 सचिव प्रथम 16400-20000 01 01 00
4 उप सचिव प्रथम 12000-16500 01 00 01
5 लेखाधिकारी सह प्रशा. अधिकारी द्वितीय 8000-13500 01 00 01
6 सहायक संचालक द्वितीय 8000-13500 01 00 01
7 हिन्दी/छत्तीसगढ़ अनुवादक तृतीय 5500-9000 01 00 01
8 अधीक्षक तृतीय 5000-8000 01 00 01
9 सहायक ग्रेड-1 तृतीय 4500-7000 01 00 01
10 सहायक ग्रेड-2 तृतीय 4000-6000 02 00 02
11 स्टेनोग्राफर तृतीय 4000-6000 02 02 00
12 कम्प्यूटर आपरेटर तृतीय 8000 (संविदा) 01 01 00
13 वाहन चालक तृतीय 3050-4590 02 02 00
14 भृत्य चतुर्थ
2550-3200 02 02 00
15 स्वीपर चतुर्थ
अंशकालीन 01 00 01

विभाग के उद्देश्य
राज्य में कोई औपचारिक या विशेष नीति के स्थान पर राज्य की परम्पराओं-मान्यताओं का समावेश एंव उनके सवंर्धन के लिए सांस्कृति उद्देश्यों की परिकल्पना पर बल देते हुए राज्य की सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम दिया जा रहा है । जिसके अंतर्गत राज्य, अभिलेखीय एवं गैर अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर संस्कृति को परिभाषित करेगा । राज्य, समुदायों के पारस्परिक संबन्धों को बनाये रखने एवं उनके मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा, इसके अतिरिक्त सीमावर्ती पड़ोसी राज्यों के छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबन्धों की नये परिप्रेक्ष्य में व्याख्या की जायेगी ।
छत्तीसगढ़ी राजभाषा एवं राज्य की अन्य बोलियों को प्रोत्साहित किया जावेगा । संस्कृति के ज्ञान का संचयन एवं उसका उपयोग समग्र रुप से एक सतत प्रक्रिया के रुप में देखा जायेगा । सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने एवं राज्य के विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं को एक सूत्र में बांधने हेतु एक अंतरसंकायी समिति का निर्माण किया जायेगा, जिसमें विभिन्न कलाओं एवं संकायों के उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का समावेश होगा । प्रदेश की आदिम संस्कृति के संरक्षकों और कलाकारों को दूरस्थ अंचलों से चिन्हांकित करने के परिणाममूलक प्रयास किए जाएंगे ।
स्मारकों का संरक्षण हमारी संस्कृति नीति का विशिष्ठ अंग होगा । राज्य को एक जीवंत संग्रहालय की नई परिकल्पना में रख कर विभिन्न समुदायों की संस्कृति का प्रस्तुतिकरण, नीति का एक प्रमुख भाग होगा । इसके अतिरिक्त समुदायों तत्व तथा उनके मध्य परिवेशीय अंतरसंबन्धो को नया आयास देते हुये यह प्रयास किया जावेगा । संस्कृति को संपूर्ण जीवन का आवश्यक अंग मानकर उसका संवर्धन एवं परिवर्धन क्षेत्रीय कार्यक्रम, शोध-संगोष्ठी एवं विभिन्न उत्सवों के माध्यम से कराना विभाग का ध्येय है ।
क्रियाकलाप -संस्कृति विभाग का कार्य प्रदेश की संस्कृति, साहित्य एवं पुरातत्व का संवर्धन करना है तथा उसके उत्तरोत्तर विकास के लिये कार्य करते रहना है । विभाग के क्रियाकलाप मुख्यत: निम्नानुसार है –

  • संस्कृति से संबंधित नीतिगत मामले व नीति निर्धारण कार्य ।
  • साहित्य एवं कला का विकास ।
  • सांस्कृतिक परम्परा का संरक्षण ।
  • ललित कला तथा लोक कला को प्रोत्साहन ।
  • छत्तीसगढ़ राज्य की कला, संस्कृति, परम्पराओं एवं जनभाषाओं का संरक्षण, संवर्धन, प्रोत्साहन एवं देश विदेश में उसका प्रचार-प्रसार ।
  • अर्थाभावग्रस्त कलाकारों/साहित्यकारों को पेंशन व आर्थिक सहायता ।
  • अशासकीय सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रोत्साहन व आर्थिक सहायता ।
  • चयनित कलाकारों/साहित्यकारों/विद्वानों को सम्मानित करने का कार्य ।
  • कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक विषयों के दुर्लभ एवं प्रामाणिक ग्रंथों, दस्तावेजों, स्मृति चिन्हों का संग्रह, प्रकाशन, प्रदर्शन तथा संबंधित व्याख्यान, संगोष्ठियों आदि का आयोजन ।
  • पुराने अभिलेखों का संरक्षण, संवर्धन ।
  • ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों का संरक्षण तथा संग्रहालयों का विकास ।
  • ऐतिहासिक स्मारकों को पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करना ।
  • सिनेमा अधिनियम के तहत नये सिनेमागृहों को लायसेंस ।
  • शासकीय कार्यो में हिन्दी एवं छत्तीसगढ़ी राजभाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य ।
  • शैक्षणिक संस्थाओं में हिन्दी के साथ-साथ राजभाषा के प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य ।

विभाग की प्रमुख उपलब्धियां

  1. पुरखौती मुक्तांगन संकल्पना – राज्य की संस्कृति, परंपरा, पुरातत्व, पर्यावरण और जीव-सृष्टि की सन्निधि में विकास की कल्पना को साकार करने हेतु पुरखौती मुक्तांगन का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ और राज्य के पारंपरिक शिल्पियों के द्वारा इसे सांस्कृतिक धरोहर के रुप में आकार प्रधान करने का संकल्प जीवन्त हुआ । पुरखौती मुक्तांगन रायपुर से लगभग 20 कि. मी. की दूरी पर ग्राम-उपरवारा में लगभग 200 एकड़ भूमि पर आकार ग्रहण कर रहा है ।
    महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा पुरखौती मुक्तांगन के प्रथम चरण का लोकार्पण किया गया, लोकार्पण समारोह में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने निर्माणाधीन इस योजना की सराहना की । राज्य की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के परिसर में माननीय मुख्यमंत्रीजी के हाथों पारंपरिक पौधों का रोपण कर शिल्प ग्राम निर्माण का संकल्प लिया गया । इस योजना के निर्माण कार्य हेतु ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग, अभनपुर एवं वन विभाग को क्रियान्वयन एजेन्सी के रुप में दायित्व सौंपा गया है ।
    लगभग 100 एकड़ परिक्षेत्र में फैला पुरखौती मुक्तांगन वस्तुत: राज्य का एक शैक्षणिक केन्द्र होगा जिसमें छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति, कलाशिल्प, प्राकृतिक संरचना और भौगोलिक परिदृश्य, पर्यावरण और जैव विविधता को प्रदर्शित करने हेतु विकास कार्य संपन्न कराया जाना है जिसका लोकार्पण महामहिम राष्ट्रपति के द्वारा किया गया । महामहिम द्वारा पुरखौती मुक्तांगन की इस अवधारणा की सराहना की गई है और इसे विकसित करने की दिशा निरुपति की गई है ।
    प्रथम चरण के विकास कार्य में भव्य प्रवेश द्वार, पर्यटन सूचना केन्द्र, पाथ-वे, माड़ियापथ, बैगा चौक, देवगुड़ी, छत्तीसगढ़ हाट, आभूषण पार्क, छत्तीस खम्भा चौक, जलपृष्ठीय रंगमंच, जनजातीय पारंपरिक शेड, मनोरंजक उद्यानगृह, सड़क एवं ड्रेनेज सिस्टम, लौह शिल्पियों की कार्यशाला एवं भित्तिचित्र निर्माण, सरगुजा की भित्तिचित्र का पारंपरिक जाली निर्माण, स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्ति (06) नग निर्माण कार्य, बाउण्ड्री वॉल निर्माण कार्य, छ.ग. का मानचित्र का निर्माण जिसमें छ.ग. के विभूतियों को दिखाया गया है । भू-दृश्य सौंदर्यीकरण एवं विद्युत साज-सज्जा आदि कार्य संपन्न किये जा चुके हैं ।
    इस प्रकार पुरखौती मुक्तांगन परिसर को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप प्रदान किये जाने एवं शैक्षणिक केन्द्र के रुप में स्थापित किये जाने का कार्य द्रुत गति से जारी है ।
  2. लोकोत्सव व पारंपरिक मेलों का विकास – राज्य के त्रिवेणी संगम राजिम जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को पारंपरिक रुप से मेले का आयोजन होता था, उसे नियमित स्वरुप प्रदान करने और मान्यता प्रदान करने हेतु राजिम कुंभ मेला समिति गठित किये जाने हेतु समुचित अधिनियम बनाया गया है । राज्य के संस्कृति के प्रचार एवं पर्यटन को बढ़ावा देने की दृष्टि से राजिम में शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, मठाधीश, संत-महात्माओं को आमंत्रित कर संत समागम का आयोजन कर इसे कुंभ का स्वरुप दिया गया है । सी तरह राज्य के अन्य क्षेत्रों जैसे – बस्तर दशहरा, शिवरीनारायण उत्सव, रायगढ़ में चक्रधर समारोह, सरगुजा में रामगढ़ उत्सव, बिलासपुर में बिलासा उत्सव, जांजगीर में जाज्वल्वदेव महोत्सव, सिरपुर में सिरपुर उत्सव, कांकेर में गढ़या महोत्सव, करिया धुरवा मेला, रतनपुर उत्सव, मल्हार महोत्सव, खल्लारी महोत्सव, लोक मड़ई, डोंगरगढ़, भोरमदेव महोत्सव, ताला उत्सव आदि के आयोजन जिला प्रशासन व अन्य माध्यम से समन्वय कर संचालित किये जाते हैं ।
  3. राज्योत्सव का आयोजन – राज्य स्थापना दिवस 01 नवम्बर के अवसर पर राज्य के विभिन्न अंचल के स्थापित लोक कलाकारों, कला दलों के साथ-साथ नवोदित और अल्पज्ञात कलाकारों को प्रस्तुति हेतु अवसर उपलब्ध कराया गया । जिसमें राष्ट्रीय कलाकारों के साथ नये कलाकारों की पहचान, प्रोत्साहन एवं रचनात्मक स्वरुप की झलक प्रस्तुत हुई । इस वर्ष राज्योत्सव के सात दिवसीय मुख्य समारोह में प्रदेश के लोक कलाकारों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिष्ठित कलाकारों के द्वारा आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुति दी गई ।
  4. छत्तीसगढ़ बहुआयामी संस्कृति संस्थान – राज्य के विविध सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रदर्शन, विकास, प्रचार-प्रसार, संकलन, कार्यशाला आदि के प्रत्यक्ष आयोजन से संबंधित संस्थान के विकास हेतु छत्तीसगढ़ बहुआयामी सांस्कृतिक संस्थान के गठन का निर्णय लिया गया । संस्थान में ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों, कलाकारों की एक अंतःसंकायी समिति होगी । साथ ही विविध कलाओं एवं संकायों से चयनित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ सम्मिलित होंगे । यह केन्द्र समुदायों के विशिष्ट सांस्कृतिक क्रियाकलापों को सर्वत्र प्रोत्साहित करेगा । इस योजना को साकार करने के उद्देश्य से आडिटोरियम, मुक्ताकाश मंच, आर्ट गैलरी आदि तैयार किया जाना है । बहुआयामी संस्कृति संस्थान के निर्माण हेतु राजधानी के मध्य पंडरी में 4.8 एकड़ भूमि उपलब्ध हो चुकी है । इस सांस्कृतिक परिसर के निर्माण हेतु देश भर के अनुभवी वास्तुविदों से प्राप्त प्रस्तावों के माध्यम से इसकी अवधारणा तथा स्वरुप पर निर्णय लिया गया है तथा तदनुसार शीघ्र कार्य आरंभ किया जावेगा ।
  5. प्रकाशन –
    • संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग का वार्षिक जर्नल "कोसल" का प्रकाशन किया गया ।
    • सरगुजा के प्रमुख पुरातात्विक स्थल, मंदिरों का नगर, सिली पचराही उत्खनन, बस्तर का प्रमुख प्राचीन कला केन्द्र "बारसूर", छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी एवं अंतरराष्ट्रीय पुरातत्वीय नगरी "सिरपुर" पर परिचयात्मक फोल्डर का प्रकाशन किया गया ।
    • स्वाधीनता दिवस, राज्योत्सव, राज्य दिवस, गणतंत्र दिवस आदि विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर ब्रोशर का प्रकाशन कराया गया ।
    • छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का अधिकृत दस्तावेज, प्राचीन अभिलेखों पर केन्द्रित ग्रंथ "उत्कीर्ण लेख" का बहुप्रतीक्षित परिवर्धित संस्करण का लोकार्पण हुआ ।
  6. ग्रंथालय – संस्कृति विभाग के अंतर्गत संचालित महंत सर्वेश्वरदास ग्रंथालय को राज्य स्तरीय ग्रंथालय का दर्जा दिया गया है । ग्रंथालय में ई-लाईब्रेरी के रुप में विकसित किया जा रहा है । इस ग्रंथालय में इतिहास, पुरातत्व, नृतत्व शास्त्र, लोक प्रशासन, हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता, पर्यटन एवं कम्प्यूटर आदि के अतिरिक्त हिन्दी, अंग्रेजी तथा संस्कृत साहित्य से संबंधित ग्रंथ तथा गजेटियर उपलब्ध हैं । ग्रंथालय में प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्र-छात्राओं के अध्ययन हेतु पृथक से अध्ययन कक्ष की सुविधा उपलब्ध कराई गई है । ग्रंथालय का आधुनिकीकरण कर राष्ट्रीय पुस्तकालय स्तर का बनाया जा रहा है जिसके अंतर्गत लिब्सिस सॉफ्टवेयर कंपनी, कलकत्ता से सम्पर्क कर पुस्तकालय में सॉफ्टवेयर लगवाने का कार्य प्रथम चरण पर क्रियान्वित है जिससे पाठको को पुस्तकें पढ़ने, ढूढने में विशेष सहायता मिल सकेगी ।
  7. पाण्डुलिपि मिशन – राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण मिशन के अंतर्गत प्रदेश के सभी जिले में पाण्डुलिपि सर्वेक्षण का कार्य जिला प्रशासन के सहयोग से प्रारंभ किया गया है । प्रारंभिक चरण में दूरस्थ अंचलों में पाण्डुलिपियों का चिन्हांकन और सूचीकरण किया गया है । अधिकांश पाण्डुलिपि ताड़पत्र तथा कागज पर लिखित हैं । प्राप्त पाण्डुलिपियां संस्कृत, उड़िया तथा देवनागरी लिपि में पुराण साहित्य, वैद्यक, ज्योतिष आदि विषयों से संबंधित है । पाण्डुलिपियों में 300 वर्ष तक पुराने ग्रंथों की जानकारी मिली है । राज्य के महासमुन्द जिले से सर्वाधिक पाण्डुलियां ज्ञात हुई है । जशपुर, सरगुजा, रायगढ़, कांकेर जैसे आदिवासी बहुल जिले से पाण्डुलिपियों की उपलब्धता विशेष उल्लेखनीय है । अभी तक लगभग 2000 पाण्डुलिपियां की जानकारी एकत्र हुई है । आगामी चरण में इन पाण्डुलिपियों का विषयवस्तु, तिथि, काल आदि का अध्ययन किया जाएगा । इस कार्य से एक ओर प्राचीन पाण्डुलिपियों का संरक्षण होगा, वहीं राज्य की संस्कृति, साहित्य एवं कला सम्पन्नता का नया आयाम उद्घाटित होगा ।
  8. कला एवं संस्कृति
    प्रदेश की संस्कृति एवं साहित्य के संरक्षण व संवर्धन हेतु विभागीय नीति के अनुरुप कार्यक्रम तैयार कर गतिविधियों का संचालन, विभाग द्वारा किया जाता है, जिससे समुदायों के बीच पारंपरिक संबन्धों को बनाये रखने में, उन्हें विकसित करने में, उनके जीवन, उनकी कलाओं को उत्प्रेरित किया जा सके । स्थानीय समुदायों की अबाध सांस्कृतिक परम्पराओं की पहचान, मान्यता देना, पुनर्जीवित करना, दस्तावेजीकरण, प्रस्तुति एवं उनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है । साथ ही छत्तीसगढ़ के अद्वितीय सांस्कृतिक वैविध्य एवं विशिष्ट पहचान को परिभाषित कर, उसके सीमावर्ती पड़ोसी राज्यों तथा सांस्कृतिक प्रदेशों के साथ संबंध व विनिमय स्थापित किया जा रहा है । राज्य की समृद्ध जनजातीय परंपरा के संरक्षण एवं परिवर्धन हेतु विभिन्न कार्यक्रम, जिसमें जनजातीय रहन-सहन, तौर तरीके, रीति-रिवाज, लोक नृत्य, गायन एवं अन्य परंपराओं को बनाये रखने हेतु भी कार्य किया गया है । इस हेतु विभागीय क्रियाकलाप के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में कार्यरत् स्वायत्तशासी एवं निजी क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को आर्थिक सहायता दी गई है । राजभाषा एवं संस्कृति के अन्तर्गत गठित छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग, स्वामी विवेकानंद प्रबुद्ध विश्व संस्थान, "पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ" एवं छत्तीसगढ़ सिंधी साहित्य संस्थान का गठन किया गया, जिसके माध्यम से सांस्कृतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों के विकास एवं संवर्धन की दिशा में हो रहे कार्यों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है ।
  9. आयोजन एवं उत्सव
    राज्य, नयी संस्थाओं/उत्सवों को प्रस्थापित करने के बजाय अस्तित्वमान पृष्ठभूमि वाले उत्सवों/संस्थाओं को प्रोत्साहित करता है ताकि राज्य की पारंपरिक संस्कृति अविच्छिन्न बनी रहे और समाज-संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में अंतःसंकायी संवाद कायम रहे । इस तारतम्य में विभाग द्वारा निम्नलिखित कार्यक्रम आयोजित किये गए/सहयोग प्रदान किया गया –
    • अम्बेडकर जयंती पर सांस्कृतिक कार्यक्रम । (अप्रैल 08)
    • स्वतंत्रता संग्राम के 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर विभाग द्वारा स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का सम्मान करते हुए विविध सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए । इस अवसर पर महानाट्य "जाणता राजा" का मंचन प्रस्तुत किया गया ।
    • कबीर जयंती पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन । (जून 08)
    • शास्त्रीय रागों पर आधारित "पावस-प्रसंग" का आयोजन, साईंस कॉलेज सभागार, रायपुर में भक्तिपूर्ण गीतों का सांस्कृतिक कार्यक्रम (अगस्त 08)
    • राजभवन में शास्त्रीय नृत्य पर आधारित कार्यक्रम (अक्टूबर 08)
    • बिलासपुर स्वदेशी मेला में सांस्कृतिक कार्यक्रम, दशहरा पर्व पर कुरुद, जिल-धमतरी में सांस्कृतिक कार्यक्रम । (अक्टूबर 08)
      ग्रामश्री मेला तथा स्वदेशी मेला, रायपुर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन (दिसम्बर 08)
    • कासमो, ट्रेड एण्ड बिल्ड फेयर में सांस्कृतिक कार्यक्रम (जनवरी 08)
    • छत्तीसगढ़ के फिल्मी कलाकारों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से जिलों में आयोजित राज्योत्सव तथा अन्य आयोजनों में छत्तीसगढ़ी फिल्म स्टार नाईट के आयोजन हेतु सहयोग प्रदान किया गया है ।
    • विभाग द्वारा सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने एवं छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से निम्नलिखित राज्यों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गई –
    • नवापारा, उड़ीसा दशहरा पूजा, कुल्लु दशहरा, हिमाचल प्रदेश, विरासत उत्सव, देहरादून, ओजस्वनी महोत्सव, भोपाल, मध्यप्रदेश, लोकरंग उत्सव, जयपुर विरासत उत्सव, देहरादून, उत्तरांचल, (अक्टूबर 07), पूर्व मेदनीपुर, पं. बंगाल में कृषि शिल्प एवं वाणिज्य मेला (दिसम्बर 07), घुमरा उत्सव, कालाहाण्डी, उड़ीसा, विशाखापट्नम्, आंध्रप्रदेश, ग्वालियर व्यापार मेला, मध्यप्रदेश (जनवरी 08) खारवेल फेस्टिवल, भुवनेश्वर, उड़ीसा (फरवरी 08
    • दक्षिण-मध्य-क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की सदस्यता – संस्कृति विभाग द्वारा पड़ोसी राज्यों से सांस्कृतिक संबंध विकसित करने एवं राज्य के कलाकारों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2005 से दक्षिण-मध्य-क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर की सदस्यता ग्रहण कर नियमित रुप से कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं ।
    • इसी प्रकार संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, अभिलेखन, कार्यशाला का आयोजन किया गया ।
  10. संगोष्ठियां
    अंतःसंकायी संवाद तथा स्थानीय समुदायों के सहनिर्देशित पहल से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करने के उद्देश्य से निम्नानुसार आयोजन किए गए –
    • बुद्ध जयंती के अवसर पर "छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म और कला" पर संगोष्ठी ।
    • गुरु घासीदास जयंती के अवसर पर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर संगोष्ठी ।
    • हिन्दी दिवस समारोह हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में विचार गोष्ठी ।
    • विश्व धरोहर दिवस पर गोष्ठी का आयोजन ।
    • संग्रहालय दिवस पर विचार गोष्ठी का आयोजन ।
    • छत्तीसगढ़ के मेला-मड़ई, सामाजिक एकता के प्रतीक पर संगोष्ठी ।
    • स्वामी विवेकानंद जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संगोष्ठी ।
    • छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार हरि ठाकुरजी की स्मृति में संगोष्ठी ।
    • छत्तीसगढ़ी भाषा पर आधारित संगोष्ठी ।
    • सुरता लोचन प्रसाद पाण्डेय पर आधारित संगोष्ठी का आयोजन ।
    • द्विवेदीयुगीन साहित्यकार बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव की स्मृति में संगोष्ठी का आयोजन ।
  11. प्रदर्शनी
    सांस्कृतिक परंपराओं के प्रचार-प्रसार तथा मूल स्थान व निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शनों की संकल्पना को क्रियान्वित करने हेतु राज्य की परंपराओं तथा सांस्कृतिक व कलात्मक संपदा का निम्नानुसार प्रदर्शन जनजागरुकता के उद्देश्य से किया गया/कराया जा रहा है –
    • गणतंत्र दिवस 2009 के अवसर पर विभिन्न विभागों के स्टॉलों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया ।
    • गुरु घासीदास जयंती के अवसर पर गुरु घासीदास जी से संबंधित स्थल एवं रावटियों पर आधारित प्रदर्शनी का आयोजन । (दिसम्बर 2008)
  12. लोक शिल्पियों की कार्यशाला सह प्रशिक्षण
    "आकार 2008" प्रशिक्षण शिविर के अंतर्गत मृदा शिल्प, ढोकरा शिल्प, मधुबनी चित्रकला, फड़ चित्रकला, जरदोजी कला, पट्ट चित्रकला, काष्ठ शिल्प, भित्ति चित्रकला के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्प गुरुओं द्वारा बड़ी संख्या में प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया गया । रायपुर के साथ-साथ बिलासपुर में भी आयोजित किया गया । इन शिविरों में शास्त्रीय नृत्यों का प्रशिक्षण भी दिया गया ।
  13. राजभाषा प्रभाग
    राज्य सरकार द्वारा प्रदेश की संस्क्रति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु राज्य की संस्कृति नीति के अनुरुप सांस्कृतिक गतिविधियों को एक नया आयाम प्रधान किया जा रहा है । इसके अंतर्गत छत्तीसगढ़ के विभिन्न समुदायों के सांस्कृति विकास के लिए कला एवं जीवन, मौखिक एवं लिखित परम्परा के बीच में अन्तर्सबंध की पहचान, उनके अभिलेखन, प्रदर्शन, प्रकाशन एवं प्रचार करने का प्रयास किया गया है तथा समुदायों के बीच प्रचलित संस्कृति को प्रोत्साहित करने एवं उसे विकसित करने में राज्य के संस्कृति विभाग द्वारा एक उत्प्रेरक की भूमिका का सफल निर्वहन किया जा रहा है । तद्नुसार विभागीय योजनान्तर्गत छत्तीसगढ़ अंचल के लोक पारंपरिक उत्सवों, साहित्यिक आयोजनों एवं संगोष्ठियों हेतु चालू वित्त वर्ष में कुल 203 अशासकीय संस्थाओं को अनुदान राशि रु. 99,97,407/- तथा कुल 55 ख्यातिप्राप्त अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों/कलाकारों को मासिक आर्थिक सहायता राशि रु. 9,99,000/- तथा साहित्यकार एवं कलाकार की लम्बी बीमारी दुर्घटना या दैवी विपत्ति में तत्काल सहायता प्रदान करने के उद्धेश्य से संचालित योजनान्तर्गत कलाकार कल्याण कोष से कुल 18 हितग्राहियों को राशि रु. 2,70,000/- प्रदान किये गये हैं ।
    विभाग द्वारा समय-समय पर सांस्कृतिक/साहित्यिक/सामाजिक संस्थाओं/व्यक्तियों को विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृति, पुरातत्वीय गतिविधियों एवं प्रकाशन हेतु अनुदान देकर उत्प्रेरक की भूमिका का निर्वाह किया गया । इस हेतु विभिन्न समारोहों के लिए राशि रु. 24,06,000 तथा कला-साहित्य संस्थाओं, व्यक्तियों को अनुदान राशि रु. 44,30,000/- प्रदान किया जा चुका है । विभागीय योजानान्तर्गत कुल 63 ख्यातिप्राप्त अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों/कलाकारों को मासिक आर्थिक सहायता राशि रु. 9,32,400/- तथा साहित्यकार एवं कलाकार की लम्बी बीमारी दुर्घटना या दैवी विपत्ति में तत्काल सहायता देने के उद्देश्य से कलाकार कल्याण कोष से कुल 32 हितग्राहियों को राशि रु. 4,80,000/- मात्र प्रदान किया गया ।
    राज्य की विभिन्न सांस्कृतिक गतिविधियों, कलाओं, लोक कलाओं, भाषाओं/ बोलियों आदि के सरंक्षण, संवर्धन, उन्नयन एवं विकास हेतु राज्य शासन द्वारा एक बहुआयामी सांस्कृतिक संस्थान की स्थापना की गई हैं तथा छत्तीसगढ़ को राज्य की राजभाषा का दर्जा प्रदान कर छत्तीसगढ़ के प्रचलन, विकास एवं राजकाज में उपयोग हेतु समस्त उपाय करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा “छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग” की स्थापना की गई है, जो राज्य की प्रमुख अपलब्धियों में सम्मिलित हैं ।
    स्वामी विवेकानन्दजी ने कोलकाता के पश्चात् अपने जीवन का सर्वाधिक समय रायपुर में व्यतीत किया । उनके जीवनकाल को स्मरणीय बनाने हेतु विवेकानन्द प्रबुद्ध विश्व संस्थान की स्थापना की गयी है, जिसके अंतर्गत स्वामी विवेकानंदजी के विचारों के अनुरुप अंतर्राष्टीय संबंध भारत दर्शन, प्रबंधशास्त्र, युवाकल्याण एवं ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर अध्ययन एवं शोद कार्य संचालित किया जायेगा ।
  14. पुरातत्व
    • पुरातत्वीय स्थलों का संरक्षण एवं विकास –
      विभाग द्वारा राज्य में फैली पुरासम्पदा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में पहल करते हुए महत्वपूर्ण संरक्षित पुरातत्वीय स्मारकों के परिसर का उन्नयन एवं विकास कार्य तथा स्मारकों को पर्यटन के अनुरुप विकसित करने का कार्य प्रारंभ किया गया । इसके अंतर्गत अनुरक्षण कार्य, फोटोग्राफी डॉक्यूमेंटशन तथा मॉडलिंग के तहत प्रतिकृतियों का निर्माण एवं प्रकाशन कार्य करवाया गया । पुरातत्व से संबंधित संगोष्ठियां, प्रदर्शनी एवं राज्य भर में फैले प्रमुख संरक्षित स्मारकों का अनुरक्षण एवं रासायनिक संरक्षण सम्पन्न किये गये हैं ।
    • अनुरक्षण कार्य –
      राज्य संरक्षित स्मारक स्थलों की सुरक्षा सुदृढ़ता तथा संवर्धनात्मक कार्यों के उपरांत शिव मंदिर (गढ़धनोरा, जिला बस्तर), शिव मंदिर (चंदखुरी, जिला रायपुर), सिरपुर में प्रस्तावित संग्रहालय भवन के चारों ओर बाउण्ड्रीवाल का का कार्य पूर्ण हो चुका है । आनंद प्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार (सिरपुर, जिला महासमुंद), मंदिर भग्नावशेष (महेशपुर), शिव मंदिर समूह (कलचा भदवाही), उत्खनित स्थल पचराही से प्राप्त शिव मंदिर में बाउण्ड्रीवाल, भोरमदेव मंदिर (कबीरधाम) में अनुरक्षण का कार्य प्रगति पर है । बस्तर जिले के अंतर्गत राज्य संरक्षित स्मारक स्थल शिवमंदिर छिंदगांव, शिव मंदिर ढोंढरेपाल का अनुरक्षण कार्य प्रगति पर है । 12वें वित्त आयोग के अंतर्गत मंदिर समूह गढ़धनोरा का टेण्डर किया जा चुका है ।
    • रसायनिक संरक्षण –
      इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की संग्रहालय के प्रतिमाओं का रासायनिक संरक्षण, शिव मंदिर एवं चतुर्भुजी मंदिर (धमधा) का कार्य सम्पन्न हो चुका है । धूमनाथ मंदिर (सरगांव), महेशपुर उत्खनन से प्राप्त पाषाण प्रतिमाएं, शिव मंदिर किरारीगोढ़ी कर्णेश्वर मंदिर समूह, सिहावा, सामत सरना मंदिर समूह, डीपाडीह में रासायनिक संरक्षण का कार्य प्रगति पर है ।
  15. पुरातत्वीय उत्खनन
    • वर्ष 2008-09 हेतु विभाग को भारत सरकार से तीन स्थलों के उत्खनन हेतु अनुमति प्राप्त हुई है, जिसके अनुसार पचराही, जिला कबीरधाम, महेशपुर, जिला सरगुजा एवं सिरपुर जिला महासमुंद उत्खनन का कार्य प्रारंभ कर दिया गया है ।

      सिरपुर उत्खनन से 79 कांस्य प्रतिमाएं सिरपुर के सोमवंशी शासक तीवरदेव का 1 एवं महाशिवगुप्त बालार्जुन के 3 ताम्रपत्र सेट प्राप्त हैं । अब तक सिरपुर में 32 प्राचीन
      • टीलों पर प्राचीन संरचनाएं उत्खनन से प्रकाश में आए हैं । उत्खनन में पहली बार सिरपुर में मौर्य कालीन बौद्ध स्तूप प्राप्त हुआ है । उत्खनन के साथ-साथ अनावृत्त संरचनाओं पर अनुरक्षण कार्य भी करवाया जा रहा है । सिरपुर में अभी भी उत्खनन कार्य जारी है ।
      • पचराही उत्खनन से प्रचीन मुद्राएं, पाषाण प्रतिमाएं एवं प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेष प्रकाश में आये हैं । उत्खनन के दौरान प्रागैतिहासिक काल, कल्चुरी काल, फणी नागवंश तथा मुगल काल के प्रमुख अवशेष प्राप्त हुए हैं । इस उत्खनन में छत्तीसगढ़ में पहली बार कवर्धा के फणी नागवंश का 1 स्वर्ण एवं 3 रजत मुद्रा प्रकाश में आए हैं, जिससे छत्तीसगढ़ के राजनैतिक इतिहास को एक नई दिशा मिली है । इसके अतिरिक्त कल्चुरि राजा जाजल्यदेव तथा मुगल कालीन 12 ताम्र मुद्राएं प्रकाश में आई है । उत्खनन से ज्ञात होता है कि पचराही प्रागैतिहासिक काल से लेकर मुगल काल तक सतत् रुप से मानव जाति का विचरण स्थली रहा है ।
      • महेशपुर उत्खनन से लगभग 7वीं सदी ईसवीं के सोमवंशी कला शैली के ईंटों से निर्मित ताराकृति तल योजना युक्त शिव मंदिर की संरचना ज्ञात हुई है । दक्षिण कोसल के सोमवंशी कला शैली के ताराकृति तलयोजना युक्त मंदिरों में यह विशाल है । परिसर में अन्य 4 लघु शिवमंदिर भी अनावृत्त किये गए हैं । यहां से प्रमुख रुप से स्थापत्य खंडों के अवशेष प्रकाश में आए हैं ।
        1.भग्न अभिलेख का अंश भी प्राप्त हुआ है । प्राप्त अवशेषों में ब्रिटिश कालीन 33 ताम्र मुद्राएं भी सम्मिलित हैं ।
  16. संग्रहालय
    • अतीत के अवशेषों के संरक्षण, प्रदर्शन, अध्ययन तथा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के स्त्रोतों के अनुसंधान के लिए संग्रहालयों की महत्वपूर्ण भूमिका है । राज्य शासन के विभिन्न संग्रहालयों के उन्नयन तथा नवीन संग्राहालयों की स्थापना के लिए विशेष रुप से सचेष्ट है । अंबिकापुर, रायगढ़ एवं कोरिया जिला पुरातत्व संग्रहालय बनाया जा रहा है । महंत घासीदास स्मारक सग्रहालय, रायपुर को राज्य स्तरीय संग्रहालय के समकक्ष उन्नयन किया गया है । दीर्घाओं में तकनीकी ढंग से साज-सज्जा तथा प्रदर्शन पर ध्यान दिया गया है । संग्राहालय में संगोष्ठी तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए आधुनिक प्रेक्षागार (सभागृह) का निर्माण करवाया गया है ।
    • इसके साथ-साथ जिला पुरातत्व संग्रहालय, जगदलपुर के नवीन भवन निर्माण का कार्य प्रगति में है । जिला पुरातत्व संघ द्वारा संचालित संग्रहालयों में से राजनांदगांव जिले में नवीन भवन का निर्माण तथा प्रदर्शन पूर्ण कर लोकार्पण कर दी गई है । इसके अतिरिक्त अन्य जिलों में जिला प्रशासन द्वारा संचालित जिला पुरातत्व संघ के संग्रहालय, रायगढ़ कोरबा में प्रदर्शन हेतु प्रयास जारी है । स्थानीय महत्व के अवशेषों की सुरक्षा के लिए मठपुरैना में स्थानीय संग्रहालय निर्माण कर अवशेषों को सुरक्षित प्रदर्शित किया गया है ।
    • राज्य शासन द्वारा संचालित संग्रहालय, रायपुर बिलासपुर तथा जगदलपुर के उन्नयन के साथ-साथ जिला पुरातत्व संघ के सग्रहालयों के भवन निर्माण के लिए भूमि प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास जारी है । संग्रहालयों की सुरक्षा, प्रचार-प्रसार के साथ-साथ शैक्षणिक उद्देश्य के संवर्धन हेतु इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के अंतर्गत स्थापित संग्रहालय में विभागीय व्यय से रसायनिक कार्य करवाया जा रहा है । राज्य संरक्षित स्मारक स्थल विभागीय व्यय से रसायनिक कार्य करवाया जा रहा है । राज्य संरक्षित स्मारक स्थल देवरानी-जेठानी मंदिर परिसर में पर्यटन दृष्टि से स्थानीय संग्रहालय भवन का निर्माण तथा पुरावशेषों का प्रदर्शन किया गया है । रायपुर संग्रहालय में विभागीय प्रतिकृतियां प्रचार-प्रसार हेतु प्रदर्शित कर निर्धारित मूल्य में विक्रय उपलब्ध करवाई गई हैं ।
    • राजनांदगांव तथा कोरबा में जिला पुरातत्व संग्रहालयों का निर्माण कर उन्हें प्रदर्शनार्थ प्रारंभ किया जा चुका है । इसके अतिरिक्त पंचायत स्तर पर ग्राम पासीद तथा मठपुरैना में भी स्थानीय संग्रहालयों का निर्माण किया गया है । जिला मुख्यालय कोरबा में नगर निगम, कोरबा के सहयोग से पुरावशेषों की सुरक्षा को दृष्टिगत रखते हुए वृहद संग्रहालय का निर्माण किया जा रहा है । जगदलपुर जिला मुख्यालय में नवीन संग्रहालय भवन का कार्य प्रगति पर है ।
  17. मॉडलिंग
    विभागीय गतिविधियां के अंतर्गत राज्य के महत्वपूर्ण प्राचीन कलात्मक प्रतिमाओं की प्रतिकृति तैयार कर सामान्य मूल्य में जनता को उपलब्ध कराने तथा प्रचार-प्रचार की दृष्टि से पुरातत्वीय महत्व की सुंदर प्रतिमाओं के प्लास्टर कास्ट तैयार किये जाते हैं । इस वर्ष सिरपुर में प्राप्त महिषासुरमर्दिनी, बुद्ध व पद्मपाणि का प्लास्टर कास्ट सांचा तैयार कर प्रतिकृतियों का निर्माण किया गया है । विभाग में उपलब्ध प्लास्टर कास्ट प्रतिमाओं तथा प्रकाशनों के विक्रय हेतु संग्रहालय परिसर में विक्रय केन्द्र का निर्माण कर विक्रय हेतु प्लास्टर प्रतिकृतियां व प्रकाशन उपलब्ध है ।
  18. राजिम कुंभ 2009 का आयोजन
    राज्य की धरोहर, कला, संस्कृति एवं परंपराओं के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से राजिम कुंभ मेला 2009 का आयोजन किया गया है । मुख्य आयोजन 09 फरवरी से 23 मार्च 2009 तक राजिम में किया जा रहा है । इस अवसर पर देश के कोने-कोने से साधु-संतों का समागम राजिम में आयोजित है । छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहे जाने वाले ‘राजिम’ के साथ-साथ राज्य की धरोहर, संस्कृति, परंपरा एवं कला के प्रचार-प्रसार को एक नया आयाम तो मिलेगा ही, साथ ही पर्यटन की दृष्टि से भी शासन का यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है । राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ-साथ आंचलिक कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और गोष्ठी, कवि सम्मेलन का आयोजन पूरे पंचक्रोशी क्षेत्र में किया जा रहा है । साथ ही इस अवसर पर कुंभ तट पर विभागीय प्रदर्शनी लगाई जा रही है । इस वर्ष राजिम कुंभ के दौरान 09 फरवरी, माघ पूर्णिमा, 13 फरवरी, कुंभ सक्रांति, 17 फरवरी, संत समागम, 20 फरवरी, विजया एकादशी तथा 23 फरवरी, महाशिवरात्रि प्रमुख तिथियां हैं । पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक एक माह का कल्पवास के लिए व्यवस्था और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई है ।

संचालनालय संस्कृति पुरातत्व, राभाषा, अभिलेखागार एवं संग्रहालय बजट प्रावधान की जानकारी वित्तीय वर्ष 2008-09

क्र. बजट का मद आयोजनेत्तर आयोजना योग
लेखा शीर्ष – 2205 (आंकड़े हजार रुपये में )
1 101 – ललित कलाओं की शिक्षा 2,30 1,00,00 1,02,30
2 102 – कलाओं एवं संस्कृति का संवर्धन 1,72,00 0 1,71,00
3 103 – पुरातत्व 1,45,19 1,72,00 3,17,19
4 104 – अभिलेखागार 13,16 0.00 13,16
5 105 – सार्वजनिक पुस्तकालय 0.00 1,00,00 1,00,00
6 107 – संग्रहालय 3,55,60 0.00 3,55,60
7 800 – अन्य व्यय 1,00 3,15,00 3,16,00
योग 2205 6,88,25 6,87,00 13,75,25
लेखा शीर्ष - 2202
1 102 – आधुनिक भारतीय भाषाओं और साहित्य का संवर्धन 33,97 1,00,00 1,28,97
योग 2202 33,97 1,00,00 1,28,97
लेखाशीर्ष 3454
1 110 – गजेटियर एवं सांख्यिंकी विवरण 0.00 10,26 10,26
योग 3454 0.00 10,26 10,26
योग मांग संख्या 26 7,22,22 7,97,26 15,19,48
मांग संख्या 41 आदिवासी उप योजना, 2205 कला संस्कृति
1 107 – संग्रहालय 0.00 2,50,00 2,50,00
योग मांग संख्या 41 0.00 2,50,00 2,50,00
योग मांग संख्या 26 500,38 511,81 1012,19
मांग संख्या 38 12वें वित्त आयोग की अनुशंसा के अंतर्गत प्राप्त सहायता अनुदान
1 2205-103 0.00 2,44,04 2,44,01
2 4202-106 0.00 2,00,00 2,00,00
3 योग मांग संख्या 38 0.00 4,44,01 4,44,01