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संस्कृति विभाग
छत्तीसगढ़ शासन
संस्कृति विभाग
वार्षिक प्रशासकीय प्रतिवेदन 2007 - 2008

विभाग का नाम संस्कृति विभाग
मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल
प्रमुख सचिव श्री टी राधा कृष्णन
अतिरिक्त सचिव श्री बी. के. अग्रवाल
विभागाध्यक्ष
संचालक संस्कृति एवं पुरातत्व श्री राकेश चतुर्वेदी

संस्कृति विभाग


विभाग के उद्देश्य

राज्य में कोई औपचारिक या विशेष नीति के स्थान पर राज्य की परम्पराओं-मान्यताओं का समावेश एवं उनके पोषण-सवंर्धन के लिए सांस्कृतिक उद्देश्यों की परिकल्पना पर बल देते हुए राज्य की सांस्कृतिक गतिविधियों को नया आयाम दिया जा रहा है । जिसके अंतर्गत राज्य, अभिलेखीय एवं गैर अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर संस्कृति को परिभाषित करेगा । राज्य, समुदायों के पारस्परिक संबन्धों को बनाये रखने एवं उनके मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा, इसके अतिरिक्त सीमावर्ती पड़ोसी राज्यों के छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबन्धों की नये परिप्रेक्ष्य में व्याख्या की जायेगी ।

राज्य की बोलियों को प्रोत्साहित किया जावेगा । देश एवं विश्व की दूसरी बोलियों, समुदायों के मध्य संबन्धों को प्रोत्साहित किया जायेगा । संस्कृति के ज्ञान का संचयन एवं उसका उपयोग समग्र रुप से एक सतत प्रक्रिया के रुप में देखा जायेगा । राज्य में सांस्कृति गतिविधियों को बढ़ावा देने एवं फैली हुई विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं को एक सूत्र में बांधने हेतु एक अंतरसंकायी समिति का निर्माण किया जायेगा, जिसमें विभिन्न कलाओं एवं संकायों उच्च स्तरीय विशेषज्ञों का समावेश होगा । प्रदेश की आदिम संस्कृति के संरक्षकों और वाहक कलाकारों को दूरस्थ अंचलों से चिन्हांकित करने के परिणाममूलक प्रायस किए जाएंगे ।

स्मारकों का संरक्षण संस्कृति नीति का विशिष्ट अंग होगा । राज्य को एक जीवंत संग्रहालय की नई परिकल्पना में रख कर विभिन्न समुदायों की संस्कृति का नये रुप में प्रस्तुतिकरण, नीति का एक प्रमुख भाग होगा । इसके अतिरिक्त समुदायों के जैविकसांस्कृतिक तत्व तथा उनके मध्य परिवेशीय अंतरसंबन्धो को नया आयाम देते हुये यह प्रयास किया जावेगा । संस्कृति को संपूर्ण जीवन का आवश्यक अंग मानकर उसका संवर्धन एवं परिवर्धन क्षेत्रीय कार्यक्रम, शोध-संगोष्ठी एवं विभिन्न उत्सवों के माध्यम से करना विभाग का ध्येय है ।

क्रियाकलाप

संस्कृति विभाग का कार्य प्रदेश की संस्कृति, साहित्य एवं पुरातत्व का संवर्धन करना है तथा उसके उत्तरोत्तर विकास के लिये कार्य करते रहना है। विभाग के क्रियाकलाप मुख्यत: निम्नानुसार है-

  • संस्कृति से संबंधित नीतिगत मामले व नीति निर्धारण कार्य ।
  • साहित्य एवं कला का विकास ।
  • सांस्कृतिक परम्परा का संरक्षण ।
  • ललित कला तथा लोक कला को प्रोत्साहन ।
  • छत्तीसगढ़ राज्य की कला, संस्कृति, परम्पराओं एवं जनभाषाओं का संरक्षण, संवर्धन, प्रोत्साहन एवं देश विदेश में उसका प्रचार-प्रसार ।
  • अर्थाभावग्रस्त कलाकारों/साहित्यकारों को पेंशन व आर्थिक सहायता ।
  • अशासकीय सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रोत्साहन व आर्थिक सहायता ।
  • चयनित कलाकारों/साहित्यकारों/विद्वानों को सम्मानित करने का कार्य ।
  • कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक विषयों के दुर्लभ एवं प्रामाणिक ग्रंथों, दस्तावेजों, स्मृति चिन्हों का संग्रह, प्रकाशन, प्रदर्शन तथा संबंधित व्याख्यान, संगोष्ठियों आदि का आयोजन ।
  • पुराने अभिलेखों का संरक्षण, संवर्धन ।
  • ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों का संरक्षण तथा संग्रहालयों का विकास ।
  • ऐतिहासिक स्मारकों को पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करना ।
  • सिनेमा अधिनियम के तहत नये सिनेमागृहों को लायसेंस ।
  • शासकीय कार्य में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य ।
  • शैक्षणिक संस्थाओं में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य ।

विभाग की प्रमुख उपलब्धियां

  • छत्तीसगढ़ को राजभाषा बनाने की बहुप्रतीक्षित कार्यवाही पूर्ण की गई है और संविधान की आठवीं अनुसूची में छत्तीसगढ़ी को शामिल करने के लिए कार्यवाही की जा रही है ।
  • रायपुर में स्वामी विवेकानन्द ने अपने जीवन के दो वर्ष व्यतीत किए । इस पृष्ठभूमि में राज्य में "विवेकानन्द प्रबुद्ध संस्थान" स्थापना का निर्णय लिया गया है ।
    1. प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150 वीं वर्षगांठ – वर्ष 2007-08 में पूरे देश के साथ-साथ राज्य में भी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है । यह स्वाधीनता की 60वीं वर्षगांठ, वन्देमातरम् को अंगीकार करने का शताब्दी के वर्ष, शहीद भगत सिंह के शहादत की 75वीं वर्षगांठ तथा उनकी जन्म शताब्दी के वर्ष के रुप में मनाये जाने का निर्णय लिया गया है । इस क्रम का आरंभ 11 मई 2007 को माननीय मुख्यमंत्री, माननीय संस्कृति मंत्री तथा अन्य अतिथियों की गरिमामय उपस्थिति में महामहिम राज्यपाल महोदय द्वारा किया गया । आयोजन में वर्ष भर चलने वाले कार्यक्रमों की रुपरेखा स्पष्ट की गई तथा प्रदेश के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का श्रीफल, शाल तथा स्मृति चिन्ह से सम्मान किया गया । साथ ही देशभक्तिपूर्ण गीत-संगीत का सांस्कृतिक कार्यक्रम तथा ध्वनि-प्रकाश कार्यक्रम आयोजित किया गया । इसके तहत राजधानी रायपुर तथा राज्य के विभिन्न जिलों में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 पर आधारित विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है । राज्य के वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में भाग लेने हेतु सहयोग प्रदान किया गया ।
      • प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 की 150 वीं वर्षगांठ पर भारत छोड़ो आंदोलन पर केन्द्रित कार्यक्रम तथा स्वतंत्रता दिवस पर ‘जरा याद करो कुर्बानी’ सांस्कृतिक कार्यक्रम । (अगस्त 07)
      • वंदेमातरम् दिवस पर देशभक्ति पूर्ण सांगीतिक प्रस्तुति तथा शहीद भगत सिंह की 100 वी जयंती पर सांस्कृतिक कार्यक्रम (सितम्बर 07)
      • गांधी जयंती पर महात्मा गांधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन’ के साथ-साथ अन्य धार्मिक भजनों की प्रस्तुति, संगोष्ठी तथा सांस्कृतिक (अक्टूबर 07)
      • शहीद वीरनारायण सिंह जी पर आधारित एक फीचर फिल्म का प्रदर्शन तथा संगोष्ठी का आयोजन (दिसम्बर 07)
    2. पाण्डुलिपि मिशन – राष्ट्रीय पाण्डुलिपि सर्वेक्षण मिशन के अंतर्गत प्रदेश के सभी जिले में पाण्डुलिपि सर्वेक्षण का कार्य जिला प्रशासन के सहयोग से प्रारंभ किया गया है । प्रारंभिक चरण में दूरस्थ अंचलों में पाण्डुलिपियों का चिन्हांकन और सूचीकरण किया गया है । अधिकांश पाण्डुलिपि ताड़पत्र तथा कागज पर लिखित हैं । प्राप्त पाण्डुलिपियां संस्कृत, उड़िया तथा देवनागरी लिपि में पुराण साहित्य, वैद्यक, ज्योतिष आदि विषयों से संबंधित है । पाण्डुलिपियों में 300 वर्ष तक पुराने ग्रंथों की जानकारी मिली है । राज्य के महासमुन्द जिले से सर्वाधिक पाण्डुलिपियां ज्ञात हुई है । जशपुर, सरगुजा, रायगढ़, कांकेर जैसे आदिवासी बहुल जिले से पाण्डुलिपियों की उपलब्धता विशेष उल्लेखनीय है । अभी तक लगभग 2000 पाण्डुलिपियां की जानकारी एकत्र हुई है । आगामी चरण में इन पाण्डुलिपियों का विषयवस्तु, तिथि, काल आदि का अध्ययन किया जाएगा । इस कार्य से एक ओर प्राचीन पाण्डुलिपियों का संरक्षण होगा, वहीं राज्य की संस्कृति, साहित्य एवं कला सम्पन्नता का नया आयाम उद्घाटित होगा ।
    3. पुरखौती मुक्तांगन संकल्पना – राज्य की संस्कृति, परंपरा, पुरातत्व, पर्यावरण और जीव-सृष्टि की सन्निधि में विकास की कल्पना को साकार करने हेतु पुरखौती मुक्तांगन का निर्माण कार्य प्रारंभ हुआ और राज्य के पारंपरिक शिल्पियों के द्वारा इसे सांस्कृतिक धरोहर के रुप में आकार प्रदान करने का संकल्प जीवन्त हुआ । पुरखौती मुक्तांगन रायपुर से लगभग 20 कि. मी. की दूरी पर ग्राम-उपरवारा में लगभग 200 एकड़ भूमि पर आकार ग्रहण कर रहा है ।
      महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा विगत वर्ष पुरखौती मुक्तांगन के प्रथम चरण का लोकार्पण किया गया, लोकार्पण समारोह में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने निर्माणाधीन इस योजना की सराहऩा की । राज्य की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के परिसर में माननीय मुख्यमंत्रीजी के हाथों सल्फी पौधों का रोपण कर शिल्प ग्राम निर्माण का संकल्प लिया गया । इस योजना के निर्माण कार्य हेतु ग्रामीण अभियांत्रिकी विभाग, अभनपुर एवं वन विभाग को क्रियान्वयन एजेन्सी के रुप में दायित्व सौंपा गया है ।
      परिसर में माड़िया पाथ- वे के निर्माण सहित इस मार्ग को आकर्षित स्वरुप दिया गया है । वन विभाग के माध्यम से वनौषधि पार्क का कार्य पूर्ण हो चुका है । पारंपरिक आभूषण पार्क तथा पारंपरिक लोक नृत्य यथा- गौर नृत्य, पंथी नृत्य एवं राउत नाच को प्रतिकृतियों के माध्यम से प्रदर्शित किया जा रहा है । प्रवेश द्वार पर बनी कांच की छतरियों का कार्य पूर्ण करा लिया गया है । मुख्य प्रवेश-द्वार का कार्य तथा विभिन्न टीलों पर बनी लौह छतरियों का कार्य पूर्णता की ओर है । सरगुजा का रजवार गृह का कार्य शीघ्र आरंभ किया जा रहा है । पुरखौती मुक्तांगन में विभिन्न विधाओं के लोक कलाकारों को आमंत्रित कर कार्यशाला आयोजित किया गया है । मुक्तांगन परिसर में 100 नग सोलर खम्बे का कार्य पूर्ण हो चुका है ।
    4. लोकोत्सव व पारंपरिक मेलों का विकास – राज्य के त्रिवेणी संगम राजिम जहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को पारंपरिक रुप से मेले का आयोजन होता था, उसे नियमित स्वरुप प्रदान करने और मान्यता प्रदान करने हेतु राजिम कुंभ मेला समिति गठित किये जाने हेतु समुचित अधिनियम बनाया गया है । राज्य के संस्कृति के प्रचार एवं पर्यटन को बढ़ावा देने की दृष्टि से राजिम में शंकराचार्य, महामंडलेश्वर, मठाधीश, संत-महात्माओं को आमंत्रित कर संत समागम का आयोजन कर इसे कुंभ का स्वरुप दिया गया है । इसी तरह राज्य के अन्य क्षेत्रों जैसे- बस्तर दशहरा, शिवरीनारायण उत्सव, रायगढ़ में चक्रधर समारोह, सरगुजा में रामगढ़ उत्सव, बिलासपुर में बिलासा उत्सव, जांजगीर में जाज्वल्वदेव महोत्सव, सिरपुर में सिरपुर उत्सव, कांकेर में गढ़िया महोत्सव, करिया धुरवा मेला, रतनपुर उत्सव, मल्हार महोत्सव, खल्लारी महोत्सव, लोक मड़ई, डोंगरगढ़, भोरमदेव महोत्सव, ताला उत्सव आदि के आयोजन जिला प्रशासन व अन्य माध्यम से समन्वय कर संचालित किये जाते हैं ।
    5. राज्योत्सव का आयोजन- राज्य स्थापना दिवस 1 नवम्बर के अवसर पर राज्य के विभिन्न अंचल के स्थापित लोक कलाकारों, कला दलों के साथ-साथ नवोदित और अल्पज्ञात कलाकारों को प्रस्तुति हेतु अवसर उपलब्ध कराया गया । जिलों में जिला प्रशासन के माध्यम से तीन दिवसीय राज्योत्सव का आयोजन किया गया, जिसमें राष्ट्रीय कलाकारों के साथ नये कलाकारों की पहचान, प्रोत्साहन एवं रचनात्मक स्वरुप की झलक प्रस्तुत हुई । इस वर्ष राज्योत्सव के सात दिवसीय मुख्य समारोह में प्रदेश के लोक कलाकारों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों के प्रतिष्ठित कलाकारों के द्वारा आकर्षक सांस्कृतिक प्रस्तुति दी गई ।
    6. छत्तीसगढ़ बहुआयामी संस्कृति संस्थान – राज्य के विविध सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रदर्शन, विकास, प्रचार-प्रसार, संकलन, कार्यशाला आदि के प्रत्यक्ष आयोजन से संबंधित संस्थान के विकास हेतु छत्तीसगढ़ बहुआयामी सांस्कृतिक संस्थान के गठन का निर्णय लिया गया । संस्थान में ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों, कलाकारों की एक अंतःसंकायी समिति होगी । साथ ही विविध कलाओं एवं संकायों से चयनित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ सम्मिलित होंगे । यह केन्द्र समुदायों के विशिष्ट सांस्कृतिक क्रियाक्लापों को सर्वत्र प्रोत्साहित करेगा । इस योजना को साकार करने के उद्देश्य से आडिटोरियम, मुक्ताकाश मंच, आर्ट गैलरी आदि तैयार किया जाना है । ‘बहुआयामी संस्कृति संस्थान’ के निर्माण हेतु राजधानी के मध्य पंडरी में 4.8 एकड़ भूमि उपलब्ध हो चुकी है । इस सांस्कृतिक परिसर के निर्माण हेतु देश भर के अनुभवी वास्तुविदों से प्राप्त प्रस्तावों के माध्यम से इसकी अवधारणा तथा स्वरुप पर निर्णय लिया गया है तथा तदनुसार शीघ्र कार्य आरंभ किया जावेगा ।
    7. कलाकारों की पहचान चिन्हारी – राज्य के सुदूर अंचलों के लोक कलाकारों की पहचान करने, उनका सम्मान करने एव यथासंभव उन्हें प्रस्तुति का मौका प्रदान करने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग द्वारा दूरदराज के अंचलों में लोक कलाकारों का सर्वेक्षण एवं सूचीबद्ध कर सम्मान पत्र भेंट करने की अभिनव योजना चिन्हारी आरंभ की गई है । राज्य की लुप्त होने की कगार पर पहुंच गई लोक कलाओं के संरक्षण एवं प्रचार-प्रासर की दृष्टि से विभिन्न लोक कलाओं की प्रतियोजित की जा रही है, जिसमें कि विभिन्न कलाओं के अभिलेखन का कार्य भी किया जाएगा ।
    8. अनुदान – विभाग द्वारा समय-समय पर सांस्कृतिक/साहित्यिक/सामाजिक संस्थाओं/व्यक्तियों को विभिन्न साहित्यिक, सांस्कृतिक, पुरातत्वीय गतिविधियों एवं प्रकाशन हेतु अनुदान देकर उत्प्रेरक की भूमिका का निर्वाह किया गया । इस हेतु विभिन्न समारोहों के लिए राशि रु. 24,06,000 तथा कला-साहित्य संस्थाओं, व्यक्तियों को अनुदान राशि रु. 44,30,000/- प्रदान किया जा चुका है । विभागीय योजनान्तर्गत कुल 63 ख्यातिप्राप्त अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों/कलाकारों को मासिक आर्थिक सहायता राशि रु. 9,32,400/- तथा साहित्यकार एवं कलाकार की लम्बी बीमारी दुर्घटना या दैवी विपत्ति में तत्काल सहायता देने के उद्देश्य से कलाकार कल्याण कोष से कुल 32 हितग्राहियों को राशि रु. 4,80,000/- मात्र प्रदान किया गया ।
    9. प्रकाशन –
      • राज्य अलंकरण दिवस के अवसर पर छत्तीसगढ़ राज्य प्रेरक विभूतियां व सम्मान ग्रहिताओं संबंधी पुस्तिका, गणतंत्र दिवस समारोह पुस्तिका, राज्य संरक्षित स्मारकों की पुस्तिका ‘धरोहर’ का प्रकाशन किया गया है ।
      • सरगुजा के प्रमुख पुरातात्विक स्थल, मंदिरों का नगर ‘डीपाडीह’, बस्तर का प्रमुख प्राचिन कला केन्द्र ‘बारसूर’, छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी एवं अंतरराष्ट्रीय पुरातत्वीय नगरी ‘सिरपुर’ पर परिचयात्मक फोल्डर का प्रकाशन किया गया ।
      • स्वाधीनता दिवस, राज्योत्सव, राज्य दिवस, गणतंत्र दिवस आदि विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन पर ब्रोशर का प्रकाशन कराया गया ।
      • छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का अधिकृत दस्तावेज, प्राचीन अभिलेखों पर केन्द्रित ग्रंथ ‘उत्कीर्ण लेख’ का बहुप्रतीक्षित परिवर्धित संस्करण का लोकार्पण हुआ ।
      • विभागीय पत्रिका ‘बिहनिया’ अंक 6 तथा राजिम कुंभ 2008 पर केन्द्रित ब्रोशर एवं पुस्तिका का प्रकाशन किया जा सकता है
      • सांस्कृतिक पंचांग – प्रदेश की गौरवशाली परंपरा और सांस्कृतिक गतिविधियों को समय-सूत्र में माले की तरह अलंकृत करने के प्रयास को निरंतर जारी रखते हुए गत वर्ष की भांति बहु उपयोगी सांस्कृतिक पंचांग का प्रकाशन किया गया जिसका लोकार्पण एवं विमोचन गणतंत्र दिवस पर महामहिम राज्यपाल महोदय द्वारा, माननीय संस्कृति मंत्री जी की उपस्थिति में किया गया । ।
    10. पुस्तकालय – संस्कृति विभाग के अंतर्गत संचालित महंत सर्वेश्वरदास पुरस्तकालय को राज्य स्तरीय ग्रंथालय का दर्जा दिया गया है । ग्रंथालय में ई-लाईब्रेरी के रुप में विकसित किया जा रहा है । इस ग्रंथालय में इतिहास, पुरातत्व, नृतत्व शास्त्र, लोक प्रशासन, हिन्दी साहित्य, पत्रकारिता, पर्यटन एवं कम्प्यूटर आदि के अतिरिक्त हिन्दी, अंग्रेजी तथा संस्कृत साहित्य से संबंधित ग्रंथ तथा गजेटियर उपलब्ध हैं । ग्रंथालय में प्रतियोगी परीक्षाओं के छात्र-छात्राओं के अध्ययन हेतु पृथक से अध्ययन कक्ष की सुविधा उपलब्ध कराई गई है ।

कला एवं संस्कृति

प्रदेश संस्कृति एवं साहित्य के संरक्षण व संवर्धन हेतु विभागीय नीति के अनुरुप कार्यक्रम तैयार कर गतिविधियों का संचालन विभाग द्वारा किया गया है, जिससे समुदायों के बीच पारंपरिक संबन्धों को बनाये रखने में, उन्हें विकसित करने में, उनके जीवन, उनकी कलाओं को उत्प्रेरित किया जा सके । स्थानीय समुदायों की अबाध सांस्कृतिक परम्पराओं की अबाध सांस्कतिक परम्पराओं की अबाध सांस्कृतिक परम्पराओं की पहचान, मान्यता देना, पुनर्जीवित करना, दस्तावेजीकरण, प्रस्तुति एवं उनका प्रचार-प्रसार किया जा रहा है । साथ ही छत्तीसगढ़ के अद्वितीय सांस्कृतिक वैविध्य एवं विशिष्ट पहचान को परिभाषित कर, उसके सीमावर्ती पड़ोसी राज्यों तथा सांस्कृतिक प्रदेशों के साथ संबंध व विनिमय स्थापित किया जा रहा है । राज्य की समृद्ध जनजातीय परंपरा के संरक्षण एवं परिवर्धन हेतु विभिन्न विभिन्न कार्यक्रम, जिसमें जनजातीय रहन-सहन, तौर तरीके, रीति-रिवाज, लोक नृत्य, गायन एवं अन्य परंपराओं को बनाये रखने हेतु विभागीय क्रियाकलाप के साथ-साथ साहित्य, संस्कृति और कला के क्षेत्र में कार्यरत स्वायत्तशासी एवं निजी क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को आर्थिक सहायता दी गई है । राजभाषा एवं संस्कृति के अन्तर्गत सहयोगी गतिविधियों हेतु ‘पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ’ द्वारा राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियां, व्याख्यान एवं सांस्कृतिक, साहित्यिक आयोजन किए गए । प्रदेश में छत्तीसगढ़ सिंधी साहित्य संस्थान का गठन किया गया, जिसके माध्यम से सिंधी संस्कृति एवं साहित्य के विकास की दिशा में हो रहे कार्यों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है ।

आयोजन एवं उत्सव

राज्य, नयी संस्थाओं/उत्सवों को प्रस्थापित करने के बजाय अस्तित्वमान पृष्ठभूमि वाले उत्सवों/संस्थाओं को प्रोत्साहित करता है, ताकि राज्य की पारंपरिक संस्कृति अविच्छिन्न बनी रहे और समाज-संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में अंतःसंकायी संवाद कायम रहे । इस तारतम्य में विभाग द्वारा निम्नलिखित कार्यक्रम आयोजित किये गए/सहयोग प्रदान किया गया –

  • अम्बेडकर जयंती पर सांस्कृतिक कार्यक्रम । (अप्रैल 07)
  • रिदम्स ऑफ द फॉरेस्ट अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक कार्यक्रम (मई 07)
  • कबीर जयंती पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन (जून 07)
  • शास्त्रीय रागों पर आधारित ‘पावस-प्रसंग’ का आयोजन, कुरुद, धमतरी में भक्तिपूर्ण गीतों का सांस्कृतिक कार्यक्रम । (अगस्त 07)
  • राजभवन में शास्त्रीय नृत्य पर आधारित कार्यक्रम (अक्टूबर 07)
  • बिलासपुर स्वेदशी मेला में सांस्कृतिक कार्यक्रम, दशहरा पर्व पर कुरुद, जिला-धमतरी में सांस्कृतिक कार्यक्रम । (अक्टूबर 07)
  • ग्रामश्री मेला तथा स्वदेशी मेला, रायपुर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन (दिसम्बर 07)
  • कासमो, ट्रेड एण्ड बिल्ड फेयर में सांस्कृतिक कार्यक्रम (जनवरी 08)
  • छत्तीसगढ़ी फिल्म कलाकारों को प्रोत्साहन – छत्तीसगढ़ के फिल्मी कलाकारों को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से जिलों में आयोजित राज्योत्सव तथा अन्य आयोजनों में छत्तीसगढ़ी फिल्म स्टार नाईट के आयोजन हेतु सहयोग प्रदान किया गया है । विभाग द्वारा सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करने एवं छत्तीसगढ़ की कला एवं संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से निम्नलिखित राज्यों में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गई –
  • नवापारा, उड़ीसा दशहरा पूजा, कुल्लु दशहरा, हिमाचल प्रदेश, विरासत उत्सव, जयपुर, विरासत उत्सव, देहरादून, उत्तरांचल, (अक्टूबर 07), पूर्व मेदनीपुर, पं. बंगाल में कृषि शिल्प एवं वाणिज्य मेला (दिसम्बर 07), घुमरा उत्सव, कालाहाण्डी, उड़ीसा, विशाखापट्नम्, आंध्रप्रदेश, ग्वालियर व्यापार मेला, मध्यप्रदेश (जनवरी 08) खारवेल फेस्टिवल, भुवनेश्वर, उड़ीसा (फरवरी 08)
  • दक्षिण-मध्य-क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की सदस्यता – संस्कृति विभाग द्वारा पड़ोसी राज्यों से सांस्कृतिक संबंध विकसित करने एवं राज्य के कलाकारों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 2005 से दक्षिण-मध्य-क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, नागपुर की सदस्यता ग्रहण कर नियमित रुप से कार्यक्रम आयोजित किया जा रहे हैं । इसी प्रकार संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली तथा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम, अभिलेखन, कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है ।

विभाग के अंतर्गत स्थापित राज्य स्तरीय सम्मान

  • पं सुन्दरलाल शर्मा सम्मान (साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु राज्य स्तरीय सम्मान), इस वर्ष रमेशचन्द्र महारोत्रा को प्रदान किया गया ।
  • चक्रधर सम्मान (कला/शिल्प कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु राज्य स्तरीय सम्मान), इस वर्ष श्रीमती कमल केलकर को प्रदान किया गया ।
  • दाऊ मंदराजी सम्मान (लोक कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान हेतु राज्य स्तरीय सम्मान), इस वर्ष श्री कोदूराम वर्मा को प्रदान किया गया ।
  • छत्तीसगढ़ अप्रवासी भारतीय सम्मान (विदेश में रहकर देश व राज्य का प्रोत्साहन करने हेतु अंतरराष्ट्रीय सम्मान) इस वर्ष श्री वेंकटेश शुक्ल, यू.एस.ए. को प्रदान किया गया ।
    इसके अतिरिक्त अन्य विभागों द्वारा दिए जाने वाले सम्मानों के सम्मान समारोह का समन्वय एवं अलंकरण समारोह का समन्वय एवं अलंकरण समारोह संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित किया गया ।
  • स्व. देवदास बंजारे पुरस्कार – प्रख्यात पंथी नर्तक स्व. देवदास बंजारे की स्मृति में लोककला के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य करने वाले व्यक्ति/संस्था को 50 हजार रुपये व प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया जाता है ।

अनुदान एवं सहायता

अस्तित्वमान सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाली संस्थाओं को बढ़ावा, शारीरिक तथा मानसिक चुनौतियों से जूझते लोगों को प्रोत्साहन तथा सुरक्षित जीवन-यापन के लिए अर्थाभावग्रस्त संस्कृति-कर्मियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए विभागीय पहल कर, पूर्व प्रकरणों में कार्यवाही तथा नए प्रकरण तैयार कर, सहायता के लिए निम्मानुसार कार्य किए गए –

  • अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों/कलाकारों को जिला पंचायतों के माध्यम से मासिक सहायता (पेंशन) की राशि 700/- से बढ़ाकर रु. 1500/- प्रतिमाह की दर से स्वीकृत किया गया है।
  • विभाग द्वारा कलाकार कल्याण कोष से जरुरतमंद कलाकारों/साहित्यकारों को रु. 5,000/- की राशि में वृद्धि कर अधिकतम सीमा रु. 15000/- निर्धारित करते हुए कलाकारों/साहित्यकारों को आर्थिक सहायता दी गई है ।

गोष्ठियां
अंतःसंकायी संवाद तथा स्थानीय समुदायों के सहनिर्देशित पहल से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का क्रियान्वयन करने के उद्देश्य से निम्नानुसार आयोजन किए गए –

  • बुद्ध जयंती के अवसर पर ‘छत्तीसगढ़ में बौद्ध धर्म और कला’ पर संगोष्ठी ।
  • गुरु घासीदास जयंती के अवसर पर उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर संगोष्ठी ।
  • हिन्दी दिवस समारोह हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में विचार गोष्ठी ।
  • विश्व धरोहर दिवस पर गोष्ठी का आयोजन ।
  • संग्रहालय दिवस पर गोष्ठी का आयोजन ।
  • छत्तीसगढ़ के मेला-मंड़ई, सामाजिक एकता के प्रतीक पर संगोष्ठी ।
  • स्वामी विवेकानंद जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर संगोष्ठी ।
  • छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार हरि ठाकुरजी की स्मृति में संगोष्ठी ।
  • छत्तीसगढ़ी भाषा पर आधारित संगोष्ठी ।
  • सुरता लोचन प्रसाद पाण्डेय पर आधारित संगोष्ठी का आयोजन ।
  • द्विवेदीयुगीन साहित्यकार बाबू मावली प्रसाद श्रीवास्तव की स्मृति में संगोष्ठी का आयोजन ।

प्रदर्शनी
सांस्कृतिक परंपराओं के प्रचार-प्रसार तथा मूल स्थान व निर्धारित स्थानों पर प्रदर्शनों की संकल्पना को क्रियान्वित करने हेतु राज्य की परंपराओं तथा सांस्कृतिक व कलात्मक संपदा का निम्नानुसार प्रदर्शन जनजागरुकता के उद्देश्य से किया गया/कराया जा रहा है –

  • महावीर जयंती के अवसर पर छत्तीसगढ़ में जैन कला एवं परंपरा से संबंधित प्रदर्शनी का आयोजन जैन सुरिकुशल दादाबाडी, रायपुर में किया गया, जिसमें छत्तीसगढ़ की महत्वपूर्ण जैन प्रतिमाओं व स्मारकों के साथ-साथ देश की महत्वपूर्ण जैन प्रतिमाओं एवं पुरातत्वीय महत्व के स्थलों के छायाचित्र प्रदर्शित किए गए ।
  • गणतंत्र दिवस 2008 के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के छायाचित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन
  • छत्तीसगढ़ में भगवान रामचन्द्र जी के वन गमन मार्ग पर आधारित छायाचित्र प्रदर्शनी का आयोजन बिलासपुर तथा जगदपुर में किया गया (अक्टूबर 2007)
  • गुरु घासीदास जयंती के अवसर पर गुरु घासीदास जी से संबंधित स्थल एवं रावटियों पर आधारित प्रदर्शनी का आयोजन । (दिसम्बर 2007)
  • राजिम कुंभ 2008 के अवसर पर पंचक्रोशी यात्रा एवं शिल्पकारों की नजर में राजिम पर आधारित प्रदर्शनी लगाई जा रही है ।

लोक शिल्पियों की कार्यशाला सह प्रशिक्षण
‘आकार 2007’ प्रशिक्षण शिविर के अंतर्गत मृदा शिल्प, ढोकरा शिल्प, मधुबनी चित्रकला, फड़ चित्रकला, जरदोजी कला, पट्ट चित्रकला, काष्ठ शिल्प, भित्ति चित्रकला के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिल्प गुरुओं द्वारा बड़ी संख्या में प्रशिक्षणार्थियों को प्रशिक्षण दिया गया । रायपुर के साथ-साथ बिलासपुर में भी आयोजित किया गया । इन शिविरों में कुचिपुड़ि तथा कत्थक के रायगढ़ घराने के नृत्य का प्रशिक्षण भी दिया गया ।

पुरातत्व

पुरातत्वीय स्थलों का संरक्षण एवं विकास – विभाग द्वारा राज्य में फैली पुरासम्पदा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में पहल करते हुए महत्वपूर्ण संरक्षित पुरातत्वीय स्मारकों के परिसर का उन्नयन एवं विकास कार्य तथा स्मारकों को पर्यटन के अनुरुप विकसित करने का कार्य प्रारंभ किया गया । इसके अंतर्गत अनुरक्षण कार्य, मेला-उत्सव-प्रदर्शनी, फोटोग्राफी तथा माडलिंग के तहत प्रतिकृतियों का निर्माण एवं प्रकाशन कार्य करवाया गया । पुरातत्व से संबंधित संगोष्ठियां, मेला-उत्सव प्रदर्शनी एवं राज्य भर में फैले 58 संरक्षित स्मारकों का अनुरक्षण एवं रासायनिक संरक्षण सम्पन्न किए गये है ।

  • अनुरक्षण कार्य – राज्य संरक्षित स्मारक स्थलों की सुरक्षा, सुदृढ़ता तथा संवर्धनात्मक कार्यों के अंतर्गत देवरानी जेठानी मंदिर ताला, सिसदेवरी स्थित भग्न स्मारक संरचना, मठपुरैना स्थित प्रतिमाएं, कुलेश्वर महादेव मंदिर, राजिम, पासीद में कार्य प्रगति पर है । शिवमंदिर गुढ़ियारी केसरपाल तथा देवरली मंदिर समूह ढोढरेपाल का कार्य प्रस्तावित है । इसी प्रकार बस्तर में स्थित शिवमंदिर, छिंदगांव जो कि अत्यंत जीर्णशीर्ण अवस्था में है इस मंदिर के सभी स्थापत्य खंडों को नीचे उतारकर पुनः रिसेटिंग किया जावेगा ।
  • रासायनिक संरक्षण – सिद्धेश्वर मंदिर पलारी, शिव मंदिर चंदखुरी जिला रायपुर, छेरकी महल, चौरा जिला कवर्धा, शिव मंदिर नगपुरा, बजरंगबली मंदिर, सहसपुर, जिला दुर्ग, जिला पुरातत्व संग्रहालय राजनांदगांव की प्रतिमाओं एवं अस्त्र-शस्त्रों का रसायनीकरण कार्य किया गया । साथ ही 12वें वित्त आयोग के अंतर्गत देवरानी-जेठानी मंदिर, ताला, फणिकेश्वरनाथ मंदिर, फिंगेश्वर तथा मुख्यालय रायपुर में नवीन प्रयोगशाला की स्थापना का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है ।
  • सर्वेक्षण – राज्य के कवर्धा तहसील, महानदी घाटी, शिवनाथ घाटी, कांकेर, बालोद, मालखरौद, बम्हनीडीह तहसील आदि क्षेत्रों का सर्वेक्षण कार्य कराया गया है ।

संगोष्ठी

  • राज्य की प्राचीन राजधानी और प्रसिद्ध पुरातात्विक नगरी ‘सिरपुर’ में राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जो देश में पहली बार ग्रामीण स्तर पर गया । (मई 07)
  • अन्तरराष्ट्रीय पुरातत्व संगोष्ठी का आयोजन निमोरा, रायपुर में किया गया, जो भारतीय पुरातत्व परिषद का 41वां, भारतीय प्रागैतिहासिक तथा चतुर्थांश अध्ययन परिषद का 35वां तथा भारतीय इतिहास एवं संस्कृति परिषद का 31वां वार्षिक अधिवेशन भी सम्पन्न हुआ, जिसमें लब्ध प्रतिष्ठित विद्वानों के साथ-साथ स्थानीय अध्येताओं और जिलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया । (दिसम्बर 07)

पुरातत्वीय उत्खनन

  • प्राचीन नगरीं सिरपुर उत्खनन – राष्ट्रिय स्तर के पुरातत्वीय स्थल सिरपुर के समग्र विकास के लिए टास्क फोर्स का गठन किया गया एवं योजना तैयार कर विभिन्न विभागों के समन्वय से इस महत्वपूर्ण पुरातत्वीय धरोहर को विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल के रुप में विकसित करने हेतु कार्य करवाये जा रहे हैं । संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा विख्यात पुरातत्वविद् डॉ. ए.के. शर्मा के मार्गदर्शन में सिरपुर में सुरंग टीला के नाम से ज्ञात परिसर में प्रस्तर खंडों से निर्मित विशाल मंदिर संरचना प्रकाश में आया है जो छत्तीसगढ़ के प्रस्तर निर्मित स्मारकों में सबसे बड़ा है । इसी परिसर में दो गर्भगृहों से युक्त ईंटों से निर्मित विशाल आकार का भग्न संरचना भी अनावृत्त हुआ है जहां से अत्यन्त दुर्लभ सोलह कोणों से युक्त धारालिंग और सोलह कोणीय योनिपीठ प्राप्त हुआ है । परिसर में एक अन्य आवासीय स्मारक की संरचना को प्रकाश में लाया गया है । सिरपुर से हिन्दू एवं बौद्ध प्रतिमाओं के साथ जैन प्रतिमा तथा धातु प्रतिमाओं की प्राप्ति उल्लेखनीय है । प्राप्त अवशेषों का अनुरक्षण एवं उत्खनन स्थल का संरक्षण कार्य किया जा रहा है ।सिरपुर उत्खनन से प्राप्त प्रतिमाओं तथा पुरावशेषों के प्रदर्शऩ हेतु संग्रहालय निर्माण की भी योजना है
  • हांफ नदी के किनारे बसे ग्राम सिली पचराही (जिला कबीरधाम) में उत्खनन कार्य आरंभ किया गया है । इस स्थल से फणिनागवंश कालीन प्राचीन मंदिरों के अवशेष, कलाकृतियां एवं बसाहट प्राप्त होने की संभावना है ।
  • रेणु नदी के किनारे ग्राम महेशपुर (जिला सरगुजा) में सोमवंशी तथा त्रिपुरी कलचुरी कालीन शैव, वैष्णव एवं जैन स्मारकों एवं प्रतिमाओं की उपलब्धि की प्रबल संभावना है ।
  • महानदी की सहायक जलधारा झरझरा नाला के किनारे बसे ग्राम लीलर (जिला धमतरी) में पुरातत्वीय उत्खनन कराया गया, जिसमें महापाषाणीय संस्कृति के विविध उपकरण, मृदभांड तथा तत्कालीन बसाहट के अवशेष प्रकाश में आए हैं ।

संग्रहालय
महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, राज्य स्तरीय संग्रहालय है । संग्रहालय के प्रवेश दीर्घा, सिरपुर दीर्घा, प्रतिमा दीर्घा एवं शिलालेख दीर्घा में प्रदर्शन कार्य का उन्नयन करते हुए आधुनिकीकरण किया गया है । संग्रहालय के एक भाग में विविध सांस्कृतिक आयोजनों के लिए सभागार का निर्माण किया गया है । रायपुर संग्रहालय परिसर में स्थापित मुक्ताकाश रंगमंच के एक भाग को कला विथिका के रुप में विकसित किया गया है । इसमें छत्तीसगढ़ की कला-संस्कृति की चित्रमय झांकी प्रदर्शित किए जाने की योजना है । इसके एक भाग में स्थानीय चित्रकारों द्वारा निर्मित कार्टून चित्र भी प्रदर्शित किए जाएंगे । महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में ग्रंथलय के साथ संगीत संग्रहालय की स्थापना की गई है एवं इसके लिए आडियो-कैसेट, सीडी, वीडियो कैसेट, एल.पी. रिकार्ड्स का संग्रहण किया जा रहा है ।

  • छत्तीसगढ़ राज्य की पुरासम्पदा के संरक्षण और प्रदर्शन के लिए राजनांदगांव में जिला पुरातत्व संग्रहालय का निर्माण पूर्ण हो गया है, यहां प्रतिमा वीथिका, पुरातत्व वीथिका, अस्त्र-शस्त्र वीथिका, आदिवासी वीथिका तथा छायाचित्र वीथिका में प्रदर्शन कार्य पूर्ण कराया गया है । जाजंगीर-चांपा में संग्रहालय भवन निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है तथा कोरबा में संग्रहालय हेतु पुरावशेषों का संकलन कार्य प्रगति पर है । आरंग में संग्रहालय भवन निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है ।
  • रायपुर एवं राज्य के अन्य प्रमुख नगरों- अंबिकापुर, रायगढ़ एवं बिलासपुर में पुरातत्वीय संग्रहालय के स्थापना और सांस्कृतिक केन्द्र के रुप में विकसित करने की योजना है । इन केन्द्रों में क्षेत्र की लोककला का अभिलेखन, प्रदर्शन आंचलिक साहित्य पुस्तकालय तथा लोक गीतों का संग्रह और जनजातिया परंपराओं पर आधारित संग्रहालय बनाया जाएगा, साथ ही इन केन्द्रों के माध्यम से सांस्कृतिक गतिविधियाँ आयोजित की जाएगी । बिलासपुर संग्रहालय के लिए सर्किट हाउस के निकट निर्मित बाल भवन सहित 0.63 एकड़ भूमि को संग्रहालय भवन के लिए आवंटित किया गया है
  • जिला पुरातत्व संग्रहालय जगदलपुर में नवीन संग्रहालय भवन का निर्माण 12वें वित्त आयोग से स्वीकृत राशि के अंतर्गत प्रारंभ हो गया है । इस कार्य के लिए छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल को नोडल एजेन्सी नियुक्त किया गया है । कार्य प्रगति पर है। यह संग्रहालय तीन मंजिला रहेगा, जिसमें लिफ्ट का भी प्रावधान है । इसमें कलाकृति दीर्घा, जनजातीय दीर्घा और तामपत्र-शिलालेख दीर्घा आदि दीर्घाओं का निर्माण किये जाने का प्रस्ताव है ।

माडलिंग
विभागीय गतिविधियां के अंतर्गत राज्य के महत्वपूर्ण प्राचीन कलात्मक प्रतिमाओं की प्रतिकृति तैयार कर सामान्य मूल्य में जनता को उपलब्ध कराने तथा प्रचार-प्रसार की दृष्टि से पुरातत्वीय महत्व की सुंदर प्रतिमाओं के प्लास्टर कास्ट तैयार किये जाते है । इस वर्ष डीपाडीह जिला-सरगुजा से प्राप्त नृत्यरत गण एवं योद्धा गणेश की प्रतिमाओं एवं आमलक कलाकृति तथा सिरपुर से प्राप्त महिषासूरमर्दिनी, बुद्ध व पद्मपाणि का प्लास्टर कास्ट सांचा तैयार कर प्रतिकृतियों का निर्माण किया गया है । विभाग में उपलब्ध प्लास्टर कास्ट प्रतिमाओं तथा प्रकाशनों के विक्रय हेतु संग्रहालय परिसर में विक्रय केन्द्र का निर्माण कर विक्रय हेतु प्लास्टर प्रतिकृतियां व प्रकाशन उपलब्ध है ।

राजिम कुंभ 2008 का आयोजन
राज्य की धरोहर, कला, संस्कृति एवं परंपराओं के प्रचार-प्रसार की दृष्टि से राजिम कुंभ मेला 2008 का आयोजन किया गया है । मुख्य आयोजन 21 फरवरी से 06 मार्च 2008 तक राजिम में किया जा रहा है । इस अवसर पर देश के कोने-कोने से साधु-संतों का समागम राजिम में आयोजित है । छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहे जाने वाले ‘राजिम’ के साथ-साथ राज्य की धरोहर, संस्कृति, परंपरा एवं कला के प्रचार-प्रसार को एक नया आयाम तो मिलेगा ही, साथ ही पर्यटन की दृष्टि से भी शासन का यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है । राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों के साथ-साथ आंचलिक कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और गोष्ठी, कवि सम्मेलन का आयोजन पूरे पंचक्रोशी क्षेत्र में किया जा रहा है । साथ ही इस अवसर पर कुंभ तट पर विभागीय प्रदर्शनी लगाई जा रही है । इस वर्ष राजिम कुंभ के दौरान 21 फरवरी, माघ पूर्णिमा, 28 फरवरी, संत समागम का शुभारंभ, 29 फरवरी, श्री जानकी जयंती, 3 मार्च, विजया एकादशी तथा 6 मार्च, महाशिवरात्रि प्रमुख तिथियां हैं । पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक एक माह का कल्पवास के लिए व्यवस्था और सुविधाएं उपलब्ध कराई गई है ।





संस्कृति एवं पुरातत्व
(संस्कृतिक पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय बजट प्रावधान की जानकारी)
वित्तीय वर्ष 2007-08

क.

योजना का नाम

आयोजनेत्तर
आयोजना
योग
लेखा शीर्ष - 2205  
(आंकड़े लाख रूपयों में )
1 103 - पुरातत्व
147.41
108.00
255.41
2 104 - अभिलेखागार
13.01
0
13.01
3 105 - सार्वजनिक पुस्तकालय
0
36.00
36.00
4 107 – संग्रहालय+प्रथम, द्वितीय अनुपूरक
143.10
0
143.10
  योग
303.52
144.00
447.52
लेखा शीर्ष - 2202 -2205-3454  
(आंकड़े लाख रूपयों में )
1 2202 आधुनिक भारतीय भाषा
102 आधुनिक भारतीय भाषाओं और साहित्य का संवर्धन
31.56
0
31.56
2 2205 कला और संस्कृति
101 ललित कलाओं की शिक्षाक्षा
2.30
100.00
102.30
3 102 कलाओं और संस्कृति का संवर्धन
162.00
0
162.00
4

800 अन्य व्यय + द्वितीय अनुपूरक

1.00
258.50
259.50
5 3454 जनगणना सर्वेक्षण एवं सांख्यिकी
110 गजेटियर और सांख्यिकी विवरण
0
9.31
9.31
  योग
196.86
367.81
564.67
  योग मांग संख्या 26
500.38
511.81
1012.19
मांग संख्या 41-आदिवासी उप योजना, 2205 - कला एवं संस्कृति
1 107 संग्रहालय
0
250.00
250.00

वित्तीय वर्ष 2007-08 में प्रथम एवं द्वितीय अनुपूरक से प्राप्त रु. 120.50 लाख की जानकारी –

लेखा शीर्ष – 2205 (आंकड़े लाख रुपयों में)
1 102 – आधुनिक भारतीय भाषाओं और साहित्य का संवर्धन 8.50 0 8.50
2 102 – कलाओं और संस्कृति का संवर्धन 2.00 0 2.00
3 107 – संग्रहालय
10.00 0 10.00
4 800 – अन्य व्यय 0 100.00 100.00
  योग 20.50 100.00 120.50

क्रमांक कार्यालय का नाम प्रथम श्रेणी द्वितीय श्रेणी तृतीय श्रेणी चतुर्थ श्रेणी योग
1 संचालनालय संस्कृति एवं
पुरातत्व,रायपुर (छ.ग.)
भरे
रिक्त पद
09
-
05
12
55
37
28
14
95
65
2 योग स्वीकृत पद 09
17 92 42 160

विभागाध्यक्ष तथा मैदानी कार्यालयों के स्वीकृत पद संरचना -

क.

पद नाम

श्रेणी
वेतनमान
शासन द्वारा स्वीकृत पद
भरे पद
रिक्त पद
1 संचालक (आयुक्त) प्रथम
अखिल भारतीय सेवा
1
6
-
2 संयुक्त संचालक प्रथम
12000-16500
2
1
-
3 उपसंचालक प्रथम
10000-15200
6
2
-
कुल पद 9 9 -
द्वितीय श्रेणी कर्मचारी
4

सहा. संचालक

द्वितीय
8000-13500
1
-
1
5

सहा. संचालक

द्वितीय
6500-10500
1
1
1
6 प्रकाशन अधिकारी द्वितीय
8000-13500
1
1
1
7 मुद्राशास्त्री द्वितीय
8000-13500
1
-
1
8 पुरातत्ववेत्ता द्वितीय
8000-13500
2
1
1
9 ग्रंथपाल द्वितीय
8000-13500
1
1
1
10 सहायक यंत्री द्वितीय
8000-13500
1
-
1
11 मुख्य रसायनज्ञ द्वितीय
8000-13500
1
-
1
12 पुरातत्वीय अधिकारी द्वितीय
8000-13500
1
-
1
13 पुरालेख अधिकारी द्वितीय
8000-13500
1
-
1
14 पुरालेखवेत्ता द्वितीय
8000-13500
1
-
1
15 संग्रहाध्यक्ष द्वितीय
8000-13500
3
-
3
16

लेखाधिकारी

द्वितीय
8000-13500
1
1
-
17 संरक्षण अधिकारी द्वितीय
6500-10500
1
-
1
कुल पद
17 05 12
तृतीय श्रेणी कर्मचारी
18 सहा.पुरालेख अधि.तृतीय श्रेणी तृतीय
5500-9000
1
-
-
19 अधीक्षक तृतीय
5500-9000
1
-
-
20 अनुदेशक तृतीय
5500-9000
2
1
-
21 कनिष्ठ लेखाधिकारी तृतीय
5000-8000
1
-
1
22 सहायक अधीक्षक तृतीय
5000-8000
1
-
-
23 सहायक ग्रंथपाल तृतीय
5000-8000
2
2
1
24 सहायक प्रोग्रामर तृतीय
5000-8000
1
-
1
25 उपयंत्री तृतीय
5000-8000
3
1
1
26

मान चित्रकार

तृतीय
5000-8000
2
1
1
27 कलाकार तृतीय
5000-8000
2
2
1
28 रसायनज्ञ तृतीय
5000-8000
2
1
-
29 शोध सहायक तृतीय
5000-8000
2
1
1
30 सहायक वर्ग 1 तृतीय
4500-7000
1
1
-
31 तकनीकी सहायक तृतीय
4500-7000
2
2
1
32 सहायक पुरालेखपाल तृतीय
4500-7000
1
1
1
33 सहायक कलाकार तृतीय
4500-7000
2
1
-
34 सहायक रसायनज्ञ तृतीय
4500-7000
2
2
1
35 उत्खनन सहायक तृतीय
4500-7000
3
-
2
36 अनुवादक तृतीय
4500-7000
2
1
2
37 सहायक वर्ग - 2 तृतीय
4000-6000
12
12
2
38 स्टेनो ग्राफर तृतीय
4000-6000
3
1
2
39 विडीयोग्राफर/छायाचित्रकार तृतीय
4000-6000
1
1
1
40 पर्यवेक्षक तृतीय
4000-6000
1
-
1
41 सर्वेयर तृतीय
4000-6000
3
2
3
42 डाटा एन्टी ऑपरेटर तृतीय
3500-5200
8
5
8
43 मार्ग दर्शक / गाईड तृतीय
3500-5200
3
3
1
44 स्टेनों टायपिस्ट तृतीय
3050-4590
5
2
3
45 सहायक ग्रेड-3 तृतीय
3050-4590
17
11
7
46 वाहन चालक तृतीय
3050-4590
3
1
2
47 मोल्डर/सेल्समेन तृतीय
3050-4590
2
1
2
48

बाईन्डर

तृतीय
3050-4590
1
-
1
कुल पद 92 55 37
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी
49 भृत्य चतुर्थ
2550-3200
25
25
-
50 चौकीदार चतुर्थ
2550-3200
3
3
-
51 चौकीदार चतुर्थ
जिलाध्यक्ष दर
1
-
1
52 फर्राश (अंशकालीन) चतुर्थ
जिलाध्यक्ष दर
1
-
1
53 केयर टेकर चतुर्थ
जिलाध्यक्ष दर
12
-
12
 योग 42 28 14
महायोग :- 160 95 65

स्वीकृत सांख्येतर पदों की जानकारी -

क्र. पद नाम श्रेणी वेतनमान शासन द्वारा स्वीकृत पद भरे पद रिक्त पद
1 केयर टेकर चतुर्थ 2550-3200 11 11  
2 केयर टेकर (नैमित्तिक) चतुर्थ 2550-3200 6 6 -
3 स्वीपर चतुर्थ 2550-3200 1 1 -
4 उद्यान रेजा चतुर्थ 2550-3200 4 4 -
5 उद्यान मजदूर चतुर्थ 2550-3200 2 2 -
6 भृत्य चतुर्थ 2550-3200 - - -
योग 24 24 -