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महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय न केवल छत्तीसगढ़ राज्य का अपितु पुराने मध्यप्रदेश का भी सर्वाधिक प्राचीन संग्रहालय है। इसके संबंध में नवीन जानकारी यह है कि डॉ. आर.एन.मिश्र द्वारा इस संग्रहालय को दिये गये रायपुर नगर के नक्शे की फोटो कापी में प्राचीन संग्रहालय भवन (Old Museum Building) दर्शाया गया है जो सन्‌ 1867 का बना है। संग्रहालय परिसर में सुरक्षित प्रस्तर लेख में इस संग्रहालय के शिलान्यास की तिथि 1875 उत्कीर्ण है। 1867 को संग्रहालय की निर्माण तिथि मान लेने से इस संग्रहालय की प्राचीनता आठ वर्ष और पीछे चली जाती है तथा हमारे देश के प्राचीनतम दस संग्रहालयों में इसका नम्बर आठवॉं हो जाता है। संग्रह की दृष्टि से भी यह पुराने मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा संग्रहालय है।

छत्तीसगढ़ एवं महाकौशल अंचल की पुरातात्विक धरोहर को सुरक्षित बनाने, उनका संग्रह कर आगामी पीढ़ियों के ज्ञानवर्द्धन एवं मार्गदर्शन हेतु सांस्कृतिक चेतना से प्रभावित होकर राजनांदगांव रियासत के तत्कालीन शासक महंत घासीदास द्वारा ब्रिटिश काल में एक अष्टकोणीय संग्रहालय भवन का निर्माण करवाया गया जो ब्रिटिश वास्तुकला के अनुरूप है। वर्तमान में इस भवन में ''महाकोशल कलावीथिका'' स्थापित है तथा सांस्कृतिक गतिविधियों का संचालन होता है।

कालान्तर में स्थानाभाव के कारण पुराना संग्रहालय भवन छोटा पड़ने लगा तथा नवीन बड़े संग्रहालय भवन की आवश्यकता महसूस की गई जिसके फलस्वरूप नवीन संग्रहालय भवन का निर्माण 1953 में सम्पन्न हुआ। यह वर्तमान भवन है। इस संग्रहालय भवन का लोकार्पण गणतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के करकमलों द्वारा किया गया। इसके निर्माण हेतु महंत घासीदास जी की पुण्य स्मृति में रानी ज्योति देवी ने रूपये एक लाख पचास हजार मात्र का आर्थिक सहयोग प्रदान किया साथ ही महंत सर्वेश्वरदास की स्मृति में एक सार्वजनिक ग्रंथालय की स्थापना हेतु पचास हजार रुपये का दान दिया जिसके परिणाम स्वरूप यह संग्रहालय एवं सार्वजनिक ग्रंथालय विकसित हुए।

इस संग्रहालय में वर्तमान में कुल 17279 पुरावशेष एवं कलात्मक सामग्रियां हैं जिनमें 4324 सामग्रियां गैरपुरावशेष हैं तथा शेष 12955 पुरावशेष हैं।

भू-तल :-
इस उत्तराभिमुख संग्रहालय भवन के भू-तल में तीन दीर्घायें हैं -

1.कलाकौद्गाल/प्रतिकृति दीर्घा (Entrance Gallery):-

अन्दर मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों पार्श्व में एक-एक काउन्टर निर्मित हैं। पहले काउन्टर पर हेड केयर टेकर बैठता है जो दर्शकों को टिकिट देता है एवं दर्शकों के निजी सामानों को सुरक्षित रखवाता है। दूसरा काउन्टर प्रतिकृति-- प्रकाशन विक्रय का है। जहॉं से विभागीय प्रकाशनों एवं मूर्तियों के प्लास्टर कास्ट का विक्रय होता है। धातु निर्मित कलाकृतियां एवं काष्ठ निर्मित कलाकृतियां प्रदर्शन में है। चुने हुए चांदी एवं ताम्बे के सिक्के, आहत सिक्के, राजपूत कलचुरि सिक्के, मुगल बादशाहों के सिक्के के छायाचित्र प्रदर्शित किये गये हैं।

2. पुरातत्व/सिरपुर दीर्घा (Archaeological Gallery) :-

आदिमानव द्वारा प्रयुक्त पाषाण अस्त्र, तॉंबे के औजार (1870 में गुंगेरिया, जिला बालाघाट से प्राप्त कुल्हाड़ियॉं, सब्बल आदि) सिरपुर उत्खनन में प्राप्त गण मूर्तियां, हाथी, घोड़ा, बैल, भैंस, भेड़, हिरण, स्त्री की आकृतियॉं, मिट्‌टी के बर्तन यथा- हण्डी कटोरे, दिये, छोटी-छोटी थालियॉं आदि प्रदर्शित किये गये हैं मिट्‌टी की मुहरें भी प्रदर्शित की गई हैं। इनमें वाराणसी के राजा धनदेव की मुहर पर ब्राह्‌मीलिपि में नाम उत्कीर्ण हैं। यह अति महत्वपूर्ण है। धारणी बीजमंत्र युक्त मिट्‌टी की बहुत मुद्रायें सिरपुर से मिली हैं जो प्रदर्शन में हैं। उत्खनन से प्राप्त लोहे के तराजू तथा अन्य घरेलू लौह उपकरण संडसी, चिमटी, कैंची, फुंकनी आदि भी प्रदर्शित हैं।

3. कल्चुरी प्रतिमा दीर्घा (Sculptural Gallery) :-

इस दीर्घा में कारीतलाई जिला जबलपुर एवं छत्तीसगढ़ अंचल के देवी-देवताओं नायक-नायिकाओं एवं वास्तुखण्डों को प्रदर्शित किया गया है। प्राचीन पाषाण प्रतिमाओं में रतनपुर (बिलासपुर जिला) की चतुर्भुजी स्थानक, विष्णु प्रतिमा, जैन अम्बिका देवी, गंगा-यमुना, पार्श्वनाथ महावीर एवं कल्याण सुन्दर स्वरूप की (शिव पार्वती-परिणय की) सिरपुर से प्राप्त प्रतिमा, रूद्रेश्वर शिवमंदिर, रूद्री (धमतरी) की अलंकृत द्वार चौखट नागराज, त्रिपुरान्तक शिव, नटराज, अनन्तशायी विष्णु, जैन सर्वतोभद्रिका, सहस्त्र जिन चैत्यालय आदि विशिष्ट महत्वपूर्ण कलाकृतियां हैं।

4. अभिलेख दीर्घा (Inscription Gallery) :-

छत्तीसगढ़ के विभिन्न स्थानों से प्राप्त प्राचीन अभिलेख, दान पत्र एवं ताम्रपत्र लेखों एवं प्रशस्ति लेखों का अच्छा संग्रह है। शरभपुरीय सोमवंशीय, त्रिपुरी शाखा के कलचुरि राजाओं, रतनपुर के कलचुरि राजाओं भानुदेव का शिलालेख, शरभपुरीय राजा सुदेवराज का ताम्रपत्र लेख, पाण्डुवंशी राजा महाशिवगुप्त का ताम्रपत्र लेख पृथ्वीदेव-2 के तामपत्र लेख, कलचुरि राजा प्रतापमल्ल देव का ताम्रपत्र लेख महत्वपूर्ण हैं। कवर्धा के फणि नागवंशीय राजा रायपुर शाखा के कलचुरि एवं कांकेर के सोमवंशी नरेशों के उत्कीर्ण लेख इस दीर्घा में प्रदर्शित हैं। कलचुरि राजा लक्ष्मणराज का शिलालेख, कलचुरि पृथ्वी देव-2 का शिलालेख, कलचुरि जाजल्लदेव-2 का शिलालेख, कांकेर के सोमवंशीय राजा का शिलालेख भी इस दीर्घा में प्रदर्शित हैं। यहां बिलासपुर जिले के किरारी गांव के हीराबांधा तालाब से प्राप्त दुसरी शताब्दी का एक मात्र दुर्लभ काष्ठ स्तंभ लेख प्रद्रशित है जो संपूर्ण भारत में अपने तरह का पहला लेख है।

प्रथम तल :-
इसमें मात्र दो दीर्घा हैं -

5. प्रकृति इतिहास दीर्घा (Natural History Gallery) :-

इस दीर्घा में विविध प्रकार के पशु, पक्षी, सर्प आदि प्रदर्शित हैं। पक्षियों में करीब 100 भारतीय पक्षियों की किस्में यथा कौआ, मैना, तोता, उल्लू, बगुला, कबूतर, नीलकंठ, बया, कोयल, गिद्ध, मोर आदि मृत जीव-जन्तु प्रदर्शित किये गये हैं। जानवरों में चीता, भालू, जंगली सुआ, लोमड़ी, हिरण, बन्दर आदि प्रदर्शित हैं। इनके अतिरिक्त अजगर, कोंड़िया सांप, बनबिलाव, कस्तूरी, उदबिलाव आदि जीव भी प्रदर्शन में हैं। मनोरंजक एवं ज्ञानवर्द्धक होने के कारण यह दीर्घा बच्चों एवं विद्यार्थियों में अधिक लोकप्रिय है।


6. अस्त्र-शस्त्र एवं मुद्रा शास्त्रीय दीर्घा :-

इस दीर्घा में संग्रहालय में संग्रहीत चुने हुए अस्त्र-शस्त्र यथा- तीर-कमान, धनुष-बाण, फरसे, कुल्हाड़ियॉं, बरछे आदि प्रदर्शित किये गये हैं।

इसी तरह से कुछ दीवार में टंगे शो-केसों में प्राचीन मुद्रायें प्रदर्शित की गई हैं। चुने हुए चांदी एवं ताम्बे के सिक्के, आहत सिक्के, राजपूत कलचुरि सिक्के, मुगल बादशाहों के सिक्के के छाया चित्र प्रदर्शित किये गये हैं।

द्वितीय तल-

द्वितीय तल में पेंटिंग दीर्घा एवं जनजातीय (मानव शास्त्रीय) दीर्घायें हैं।

7. पेंटिंग दीर्घाः-

भारत के विभिन्न राज्यों के कलाकारों द्वारा बनाई गयी कलाकृतियां संग्रहित है, जिसमें छत्तीसगढ़ का गोदना चित्रकला, बिहार की मधुबनी, उड़ीसा का पट चित्रकला, राजस्थान की पेंटिंग, मध्यप्रदेद्गा की भील जनजाति की पेंटिंग, गुजरात की कलमकारी एवं उड़ीसा का ताड़पत्र चित्रकला है। साथ ही मंडला तथा हिमाचलप्रदेद्गा की काष्ठ कला, बस्तर के नाप पात्र, कर्नाटक की बिदरी कला, उड़ीसा के नक्काशी वाले बर्तन, आंध्रप्रदेद्गा के पारंपरिक खिलौने, बस्तर के मुखौटे आदि संग्रहित है तथा विभिन्न आयुधों से सुसज्जित देवी एवं देवताओं की धातु की प्रतिमायें संग्रहित है।

8. जनजातीय (मानव शास्त्रीय) दीर्घा :-

द्वितीय तल में ही यह आठवां दीर्घा हैं जिसमें माड़िया, गोंड, बैगा, कोरकू, उरॉंव, बंजारा आदि जनजातियों के उपयोग में आने वाले कपड़े, गहने, बर्तन-भांड़े, शस्त्र, वाद्य उपकरण एवं अन्य दैनिक उपयोग की सामग्रियॉं प्रदर्शित की गई हैं। दैनिक उपयोग की वस्तुओं में माड़िया जाति की पत्तों की बरसाती, छाल का लहंगा, पानी एवं सुरा रखने की सुराही, एक पल्ले की तराजू, घास के बीजों का थैला, पत्तों की टोकनी, लकड़ी के कंघे और हेयर पिन आदि प्रदर्शन में हैं।

एक शो-केस में वाद्यों, धनुष-बाण एवं चिड़िया मारने वाले गुटरू (गुलेल) को प्रदर्शित किया गया है। नृत्य की पोशाकों में अधिक पोशाक उरॉंव एवं माड़िया जनजाति की है। एक शो-केस में ककनी, हंसली, बिछिया, अंगूठी, सूता, बाजड़ी, साड़ी, चोली आदि वस्त्र प्रदर्शित किये गये हैं। किन्तु बहुत अधिक पुरावशेष एवं सामग्रियॉं होने के कारण अब पुनः संग्रहालय में स्थान का अभाव खटकने लगा है।

छत्तीसगढ़ के नया राज्य बन जाने के कारण राजधानी स्थित इस संग्रहालय का महत्व बहुत बढ़ गया है। इसे राज्य स्तर के संग्रहालय का दर्जा दिया जा सकता है।