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जिला पुरातत्व संग्रहालय, जगदलपुर की स्थापना वर्ष 1988 में किया जाकर प्रथमतः फरवरी 88 में निजि भवन कुम्हारपारा में संग्रहालय प्रारंभ किया गया। उसके उपरांत 25.11.92 में जगदलपुर स्थित राऊतपारा क्षेत्र में स्थानांतरित किया गया इसके बाद वर्ष 1998 में शासकीय भवन परलकोटवाड़ा में स्थानांतरित होकर आज तक इसी भवन में संग्रहालय कार्यरत है।

संग्रहालय में वैष्णव, शैव एवं शाक्त धर्म से संबंधित मूर्तियां प्रदर्शित हैं जिसमें द्विभुजी विष्णु की प्रतिमा जो अत्यंत दुर्लभ है, लगभग 6वीं सदी ईसवी की है। यह प्रतिमा गढ़धनोरा से संकलन की गई है। इसके अतिरिक्त इस संग्रहालय में पार्वती की प्रतिमा प्रदर्शित है यहां देवी त्रिशुल लिए जलहरी के मध्य खड़गासन में है।

उक्त मूर्तियों के अतिरिक्त गणेश, उमा महेश्वर, मिथुन मूर्तियां एवं शिलालेख प्रदर्शित है। संग्रहालय स्थापना का उद्‌देश्य बस्तर की संस्कृति, इतिहास और पुरातात्विक धरोहर को सहेजने, समेटने और कला का प्रदर्शन करना था।

जगदलपुर जिला पुरातत्व संग्रहालय की शुरूआत जिलाध्यक्ष बंगला में रखी हुई टुटी-फुटी मात्र 25 पुरावशेषों से हुई थी एवं अब संग्रहालय में 185 पुरावशेष संग्रहीत है।
जगदलपुर का वर्तमान संग्रहालय भवन नगर के हृदय स्थल सीरासार चौक में परलकोट बाड़ा शासकीय भवन में स्थापित है। संग्रहालय से मात्र सौ मीटर की दूरी पर सीरासार भवन है जहां पर से बस्तर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा का संचालन होता है। यही सीरासार भवन में नवरात्रि के प्रथम दिवस पूजा कर विविध विधान से जोगी बैठाई की रस्म अदा की जाती है और आठ दिनों तक फूल रथ की परिक्रमा गोल बाजार के चारों ओर घुमायी जाती है। संग्रहालय भवन से ही मात्र दो सौ मीटर की दूरी पर जगदलपुर का प्राचीन एवं बस्तर महाराजाओं की अराध्य देवी माई दन्तेश्वरी मंदिर है और इसी से लगी हुई राजवाड़ा स्थित है। जहां पर बस्तर के आदिवासी इक्ट्‌ठा होकर अपने सभी परम्परागत त्योहार मनाया करते हैं।

जगदलपुर के पुरातत्व संग्रहालय में गुप्तकाल के समकालीन नलवंशी राजाओं के काल के पुरावशेषों से लेकर छिन्दक नागों तथा काकतीय राजवंशों के शासन काल के पुरावशेष प्रदर्शित किये गये हैं। संग्रहालय के 35 पुरावशेषों को तीन गैलेरी में प्रदर्शित किये गये हैं तथा शेष पुरावशेष स्टोर में रखी गई है।

इस संग्रहालय में रखी गई कलाकृति में गढ़धनोरा से प्राप्त विष्णु प्रतिमा, नरसिंह प्रतिमा दुर्लभ प्रतिमायें है। विष्णु की द्विभुजी स्थानक प्रतिमा गुप्त कला के समतुल्य है। नृसिंह की आसनस्थ द्विभुजी प्रतिमा, प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

संग्रहालय में छोटे डोंगर से प्राप्त शिलालेख, केशरपाल से प्राप्त शिलालेख एवं कांकेर से प्राप्त शिलालेख भी संग्रहीत है। जैतगिरिन एवं अन्य जगहों से प्राप्त स्वर्ण सिक्के भी संग्रहीत हैं।
जगदलपुर के वर्तमान संग्रहालय में अबूझमाड़ से तथा जिले के अन्य क्षेत्र से जनजातीय शिल्प सामग्रियां एकत्र कर रखी गई है।

आदिवासी क्षेत्र में यही एक मात्र शासकीय संग्रहालय है जो इस क्षेत्र के पुरावशेषों की सर्वेक्षण, संवर्धन संकलन तथा आदिवासी संस्कृति के दुर्लभ सामग्रियों के प्रदर्शन हेतु प्रयासरत है। इस दृष्टि से जगदलपुर संग्रहालय को आधुनिक रूप में स्थापित किया जाने की आवश्यकता है।

नवीन संग्रहालय भवन का निर्माण प्रगति पर है शीघ्र ही विभाग को हस्तांतरण होने की संभावना है।