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राजनांदगांव जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

राजनांदगांव जिला (200,07'-22'29' उत्तरी अक्षांश तथा 80-25-81'24' पूर्वी देशान्तर) छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से दक्षिण-पश्चिम दिशा में 80 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। दक्षिण पूर्वी मध्य रेल्वे का यह महत्वपूर्ण रेल्वे स्टेशन है। यह रेल एवं बस के माध्यम से देश के महत्वपूर्ण भागों से जुड़ा है। यहां का निकटतम हवाई अड्‌डा लगभग 90 कि.मी. दूर माना, रायपुर में स्थित है। जहां से देश के महत्वपूर्ण स्थानों दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, इन्दौर, भोपाल, रायपुर, रांची, भुवनेश्वर, हैदराबाद, नागपुर आदि के लिए हवाई सेवाएं उपलब्ध हैं।

नामकरण वस्तुतः राजनांदगांव जिले का शुद्ध रूप नन्दग्राम होता है जो कि अपभ्रंश होकर नांदगांव हो गया है। क्योंकि पूर्व में यह एक रियासती राज्य था, जिसके बैरागी महंत शासक कृष्ण के उपासक थे। अतः भगवान कृष्ण के मानस पिता नन्द के नाम पर इसका नन्दग्राम नाम रखा जाना प्रासंगिक लगता है। इसके अतिरिक्त कतिपय विद्वान नांदगॉंव का अर्थ छत्तीसगढ़ी बोली में बमीठा अर्थात चीटियों का घर के आधार पर इसका नामकरण नांदगॉंव स्वीकार करते हैं।

शिवनाथ एवं बाग नदी से अभिसिंचित समसीतोष्ण जलयवायु वाला यह जिला अपने सुप्रसिद्ध धार्मिक पर्यटन स्थल बम्लेश्वरी देवी के मंदिर के लिए देश भर में विखयात है जो कि राजनांदगांव के उत्तर-पश्चिम में 40 कि.मी.दूर प्रारंभ होने वाली पर्वत श्रृंखलाओं के उच्च शिखर पर स्थित है।

जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय राजनांदगॉंव, छत्तीसगढ़ के प्रमुख संग्रहालयों में से एक है। सन्‌ 1987-88 में जिलाधीश कार्यालय परिसर के एक कक्ष से प्रारम्भ होकर आज अपने स्वतंत्र संग्रहालय भवन तक की यह यात्रा अत्यन्त रोचक है। कभी मात्र प्रतिमाओं के संग्रह से प्रारम्भ हुआ पुरातत्व संग्रहालय आज अनेक वीथिकाओं से सुसज्जित है। जिसमें प्रागैतिहासिक काल से लेकर राजनांदगॉंव जिले की रियासतों-रजवाड़ों तक का इतिहास पुरावशेषों एवं छायाचित्रों माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

संग्रहालय में संचित एवं प्रदर्शित सामग्री की एक परिचय पुस्तिका हो, इसकी आवश्यकता अनुभूत की जा रही थी। वित्तीय कठिनाइयों, स्वतंत्र के संग्रहालय भवन का अभाव, जैसे कारणों से यह संभव नहीं हो पा रहा था। अन्ततः माननीय मुखयमंत्री डॉ. रमन सिंहजी तथा संस्कृति मंत्री मान. श्री बृजमोहन अग्रवालजी की प्रेरणा तथा श्री राकेश चतुर्वेदी, संचालक संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सौजन्य से जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय का स्वयं का नव-निर्मित संग्रहालय भवन जिलाधीश कार्यालय परिसर में ही बन गया है। और संचालनालय एवं संस्कृति विभाग के अधिकारियों डॉ. जी.के.चन्द्रौल, संयुक्त संचालक तथा श्रीमती भारती श्रोती के अथक परिश्रम एवं कुशल संयोजन ने ना केवल निर्माण परियोजना में बल्कि संग्रहालय हेतु वांछित सामग्री के संग्रहण एवं प्रदर्शन तक की जिम्मेदारी का निर्वाह किया।

कोरबा जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

औद्योगिक नगरी कोरबा

Shiv Mandir Tumanकोरबा (22.3500°उ., 82.6833°पू.) की रत्नगर्भा धरा के कोष में अनमोल प्राकृतिक खजाना छुपा हुआ है, जो उजागर होकर हमें चमत्कृत और अभिभूत कर देता है । यह भूमि इतिहास के प्रत्येक चरण में मानव जाति की क्रीड़ा भूमि रही है । यह क्षेत्र नैसर्गिक सम्पदा से परिपूर्ण रहा है । हसदेव के सुरम्य और तीक्ष्ण प्रवाह से सिंचित तथा सघन वनाच्छादित उपत्यकाओं से परिवेष्टित यह भूभाग आदि मानवों द्वारा संचारित रहा है । इसके प्रमाण स्वरुप हसदेव नदी के तटों पर लघु पाषाण उपकरण प्राप्त होते हैं और कोरबा से संलग्न रायगढ़ जिले का सीमावर्ती क्षेत्र तो मानों आदि मानवों का महानगर ही था । आदि मानव को विभिन्न गतिविधियों के प्रमाण इस क्षेत्र में सुरक्षित हैं । इसी पृष्ठभूमि पर ऐतिहासिक पौराणिक पौराणिक ऋषभतीर्थ और अब छत्तीसगढ़ का औद्योगिक तीर्थ कोरबा विकसित हुआ है ।

ईस्वी पूर्व के धार्मिक पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख और घटनाओं की सम्बद्धता से भी इस क्षेत्र की प्राचीनता पर प्रकाश पड़ता है । महाभारत में उल्लेख है कि दक्षिण कोसल के प्रसिद्ध स्थल ऋषभतीर्थ में गौ-दान करने से पुण्य अर्जित होता है । इस उल्लेख की ऐतिहासिकता निकटस्थ गुंजी के शिलालेख से प्रमाणित होती है । ईसवी के आरंभिक शताब्दी से सम्बन्धित इस लेख में राजपुरुषों द्वारा सहस्त्र गौ-दान किया जाना अभिलिखित है । लेख का पाठ इस प्रकार है सिद्धम । भगवान को नमस्कार । राजा श्रीकुमारवरदत्त के पांचवें सम्वत् में हेमन्त के चौथे पक्ष के पन्द्रहवें दिन भगवान के ऋषभतीर्थ में पृथ्वी पर धर्म के समान अमात्य गोड़छ के नाती अमात्य मातृजनपालित और वासिष्ठी के बेटे अमात्य दण्डनायक और बलाधिकृत बोधदत्त ने हजार वर्ष तक आयु बढ़ाने के लिए ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान की । छठवें सम्वत् में ग्रीष्म के छठे पक्ष के दसवें दिन दुबारा एक हजार गायें दान की । यह देखकर दिनीक के नाती अमात्य और दण्डनायक इन्द्रदेव ने ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान में दीं । इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में वैदिक परम्पराओं की गतिविधियाँ सम्पन्न हुआ करती थीं । किरारी, चन्दरपुर का काष्ट स्तम्भ लेख तो अद्वितीय ही है, जिसमें राज्य अधिकारियों के पद नाम हैं ।

Shiv Mandir Tuman इस क्षेत्र को रामायण के कथा प्रसंगों से भी जोड़ा जाता है । यह क्षेत्र राम के वनागमन का क्षेत्र तो माना ही गया है, सीतामढ़ी आदि नाम इसके द्योतक हैं । निकटस्थ स्थल कोसगई में प्राप्त पाण्डवों की प्रतिमाएँ क्षेत्रीय पौराणिक मान्यताओं को और भी दृढ़ करती हैं । कोरबा के नामकरण को भी कौरवों से जोड़ा जाता है और सहायक तथ्य यह है कि इस क्षेत्र के आसपास कोरबा और पण्डो दोनों जनजातियाँ निवास करती हैं । एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि बिलासपुर जिले के ही लहंगाभाठा नामक स्थल से लगभग 12-13वीं सदी ईस्वीं का शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें तत्कालीन कौरव राजवंश की जानकारी मिलती है, जिन्होनें अपने समकालीन प्रसिद्ध क्षेत्रीय राजवंश कलचुरियों पर भी विजय प्राप्त कर ली थी । सम्भव हैसम्भव है कि इस राजवंश की राजधानी कोसगई कोरबा क्षेत्र में रही हो । इस क्षेत्र में प्रचलित पंडवानी और फूलबासन, सीता प्रसंग गाथा में ऐतिहासिक सूत्र खोजे जा सकते हैं ।

कोरबा के सीतामढ़ी में एक शिलालेख है जिसमें लगभग आठवीं सदी ईस्वीं का जीवन्त स्पन्दन है । इस शिलालेख के अनुसार यह क्षेत्र अष्टद्वार विषय में सम्मिलित था और यहाँ किसी वैद्य के पुत्र का निवास था । अष्टद्वार विषय का अर्थ तत्कालीन अड़भार क्षेत्र है । सातवीं सदी ईसवी के लगभग सक्ती के निकट स्थित अड़भार ग्राम प्रसिद्ध नगर था । यहाँ से प्राप्त एक ताम्रपत्र में भी इस क्षेत्र का नाम अष्टद्वार विषय उल्लिखित है । सम्भवत: यह नाम अड़भार के अष्टकोणीय ताराकार मंदिर अथवा आठ द्वार युक्त मिट्टी के परकोटे वाले गढ़ के नाम के आधार पर है । उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में एक अन्य प्राचीन ऐतिहासिक प्रमाणयुक्त ग्राम बाराद्वार (बारहद्वार) भी है । अंचल में प्रचलित विभिन्न दन्तकथाओं में कोरबा तथा गुंजी को अड़भार से सम्बद्ध किया जाता है ।

Durga Mandir Chaiturgarhइसके अतिरिक्त दसवीं शताब्दी के तृतीय चरण में त्रिपुरी के कल्चुरी शासकों की एक शाखा के दक्षिण कोसल में आगमन की सूचना प्राप्त होती है । जिसमें तुम्माण को अपनी राजधानी बनाकर इस क्षेत्र में शासन करना प्रारम्भ किया था । तुम्माण की भौगोलिक पहचान पूर्व लाफा जमींदारी के अंतर्गत तथा वर्तमान कोरबा जिले के कटघोरा के समीप स्थित तुमान नामक ग्राम से की जाती है । यहाँ से प्राप्त पुरावशेष एवं विशेषकर शिवमंदिर जिसे कल्चुरी अभिलेखों में वंकेश्वर देवालय के नाम वर्णन किया गया है से उक्त तथ्य की पुष्टि भी होती है । इस प्रकार कोरबा जिले में स्थित पुरातात्विक ग्राम तुमान को छत्तीसगढ़ में कल्चुरी शासकों की प्रथम राजधानी होने का गौरव प्राप्त है ।

परवर्ती काल में कोरबा जिले की विशालतम जमींदारी का मुख्यालय बना जो यहाँ के राजनैतिक प्रशासनिक महत्व का द्योतक है । यह जमींदारी 341 गावों और 856 वर्गमील में फैली थी तथा सम्भवत: सबसे अंत में रतनपुर राज्य में सम्मिलित की जा सकी अन्यथा इनकी पृथक और स्वतंत्र सत्ता थी । दूरस्थ दुर्गम और शक्तिशाली जमींदारी होने के कारण ही यह सम्भव हुआ था । कोरबा जमींदार दीवान कहे जाते थे । सम्भवत: धार्मिक उदारता के कारण इस क्षेत्र में कबीरपंथ को प्रश्रय मिला, फलस्वरुप कुदुरमाल इस पंथ के अनुयायियों के महत्वपूर्ण केन्द्र के रुप में स्थापित हुआ। यहॉ प्रतिवर्ष माघ में कबीरपंथ समाज का मेला भरता है।कुदुरमाल में दो कबीरपंथी सद्गुरुओं के अलावा प्रमुख कबीरपंथी ध्रर्मदास जी के पुत्र चुड़ामनदास जी की समाधि है ।

कोरबा के चतुर्दिक क्षेत्र में गुंजी अड़भार रायगढ़ जिले के प्रागैतिहासिक स्थलों के साथ-साथ कोसगई, पाली, रैनपुर, नन्दौर आदि ऐसे कई स्थल हैं जहाँ पुरातत्वीय सामग्री के विविध प्रकार उपलब्ध हैं । इनमें सर्वाधिक प्रसिद्‍ध और दर्शनीय स्थल पाली है । पाली ग्राम का मंदिर महादेव मंदिर के नाम से विख्यात हैं। मूलत: बाणवंशी शासक विक्रमादित्य प्रथम द्वारा निर्मित 9-10 वीं सदी ईसवी के इस मंदिर का जीर्णोद्वार कलचुरी शासक जाजल्लदेव ने 11 वीं सदी ईसवी में कराया । पूर्वाभिमुख यह मंदिर प्राचीन सरोवर के निकट जगती पर निर्मित है । मंदिर की बाह्यभित्तियाँ प्रतिमाओं से अलंकृत हैं। प्रतिमाओं में शिव के विविध विग्रह, चामुण्डा, सू्र्य दिक्पालों के साथ - साथ अप्सराएँ, मिथुन दृश्य और विभिन्न प्रकार के व्यालों का अंकन है। अलंकरण योजना और स्थापत्य की दृष्टी से यह मंदिर छत्तीसगढ़ का विकसित किन्तु संतुलित और मूर्तिशिल्प का अनूठा उदाहरण है ।

सचमुच कोरबा क्षेत्र की नैसर्गक सम्पन्नता और ऐतिहासिक अवशेषों का आकर्षण प्रबल है। जो पहले कभी ऋषभतीर्थ के रुप में श्रध्दालुओं को आकर्षित करता था, औद्योगिक तीर्थ बनकर कोरबा आज भी लोगों को आकर्षित करता है ।

कोरबा जिले की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत को सहेजने एवं प्रदर्शित करने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन द्वारा जिला पुरात्तव संघ कोरबा के माध्यम से एक भव्य नवीन संग्रहालय का निर्माण किया गया है। जिसमें मुख्य रुप से जिले के महत्वपूर्ण पुरास्थलों यथा पाली, लाफा, तुमान, कनकी, रजकम्मा, तथा बीरतराई आदि क्षेत्रों से प्राप्त मूर्तियों एवं पुरावशेषों तथा जमींदारी कालीन स्मृति चिन्हों एवं वस्त्राभूषणों को भी संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।

जन-सामान्य को प्रदेश की गौरवशाली धरोहर से परिचित कराने के उद्देश्य से संग्रहालय में एक छायाचित्र दीर्घा का भी निर्माण किया गया है । इस दीर्घा में कोरबा जिले सहित प्रदेश के महत्तवपूर्ण स्मारकों के श्रेष्ठ छाया-चित्रों को प्रदर्शित किया गया है ।

इस प्रकार यह नवीन संग्रहालय कोरबा जिले के इतिहास एवं पुरातत्व को शोधार्थियों, इतिहासकारों , विद्यार्थियों के साथ ही जन-सामान्य को भी अपनी विरासत से परिचित कराने एवं जोडने में महत्तवपूर्ण सिध्द होगा तथा आने वाले समय में बौध्दिक ज्ञान स्थल के केन्द्र के रुप में और अधिक विकसित होकर प्रदेश के महत्वपूर्ण संग्रहालयों में अपना स्थान बनायेगा ।

क्र. प्रतिमा का नाम प्राप्ति स्थल निर्माण समाग्री
1 नदी देवी गंगा छुरीकाल, कोरबा बलुआ प्रस्तर
2 नदी देवी यमुना छुरीकला, कोरबा बलुआ प्रस्तर
3 नायक-नायिका बीरतराई, कोरबा बलुआ प्रस्तर
4 गज समूह बीरतराई, कोरबा बलुआ प्रस्तर
5 त्रिपुरांतक (शिव) लाफागढ़, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
6 सिंह व्याल लाफागढ़, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
7 गज व्याल लाफागढ़, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
8 अप्सरा लाफागढ़, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
9 हरिहर लाफागढ़, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
10 अप्सरा रजकम्मा, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
11 खण्डित गज रजकम्मा, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
12 खण्डित गणेश कोसगईगढ़, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
13 नाग तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
14 गणेश तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
15 देवी तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
16 मैथुन युगल तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
17 स्थापत्य खण्ड तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
18 योनिपीठ सहित शिवलिंग तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
19 उपासक कनकी, कोरबा बलुआ प्रस्तर
20 गज समूह कनकी, कोरबा बलुआ प्रस्तर
21 स्तंभ कनकी, कोरबा बलुआ प्रस्तर
22 शीर्षविहीन सिंह कनकी, कोरबा बलुआ प्रस्तर
23 नदी देवी गंगा बीरतराई, कोरबा बलुआ प्रस्तर
24 गज समूह तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर
25 देवी समूह बिलासपुर बलुआ प्रस्तर
26 भैरवी अमरेली, कोरबा बलुआ प्रस्तर
27 सती स्तंभ देवरी, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
28 महिषासुर मर्दिनी आमाटिकरा डाली, कोरबा लाल बलुआ प्रस्तर
29 चामुण्डा तुमान, कोरबा बलुआ प्रस्तर

(टिप्पणी : संग्रहालय में संग्रहित एवं प्रदर्शित उपरोक्त प्रतिमाओं का कालखण्ड लगभग 11वीं सदी ईस्वी से 15वीं ईस्वी के मध्य अनुमानित हैं)

रायगढ जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय़

छत्तीसगढ़ प्रांत के राजधानी मुखयालय, रायपुर से उत्तर-पुर्व दिशा में 243 कि.मी. के दूरी पर रायगढ़ जिला मुखयालय स्थित है। रायगढ़ जिला अपनी सांस्कृतिक विरासत, विशेषताओ एवं पुरातत्व सामग्री के ऐतिहासिक वैविध्य से संपन्न है। इस जिले की पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा एवं असुरक्षित वैभव को संकलित कर आगामी पीढ़ी के दिग्दर्शक एवं मार्गदर्शक हेतु जिला पुरातत्व संघ, रायगढ़ द्वारा ब्रिटिश काल में सन्‌ 1937 में निर्मित ब्रिटिश स्थापत्य कला अनुरूप चौकोणीय भवन जिसके द्गिाखर को गुम्बदाकृति से अलंकृत कर बनाया गया है। जिला पुरातत्व संघ रायगढ़ द्वारा संग्रहालय हेतु इस भवन का आधिपत्य कलेक्टर, रायगढ़ के आदेश पर अप्रैल 1994 को लिया गया। इस भवन में सन्‌ 1996 से जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय का संचालन किया जा रहा है। इस संग्रहालय का नामकरण जिले के पुरातत्वविद एवं साहित्यकार पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय की स्मृति में पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय स्मृति जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय रायगढ़ किया गया है। वर्तमान में यह संग्रहालय रेल्वे स्टेशन के समीप एस.पी.ऑफिस एवं जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के पीछे एवं किरोड़ीमल नटवर हायर सेकेण्डरी स्कुल के बाजु में स्थित है। इस संग्रहालय में संग्रहित एवं प्रदर्शित पुरा सामग्री में 57 प्रस्तर प्रतिमा है। इस पुरा सामग्रियों में अष्ट धातु से निर्मित उमा महेद्गवर, प्रस्तर प्रतिमाओं में वीणा धारी शिव, चतुर्भुजी विष्णु, उमा महेद्गवर एवं पाश्र्वनाथ की प्रतिमायें एवं वनस्पति जीवाश्गम पाण्डुलिपि का विशिष्ट संग्रह है।

कोरिया जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जिला पुरातत्व संघ, कोरिया को कलेक्टर कोरिया द्वारा पुराने आफीसर्स क्लब का भवन संग्रहालय हेतु आबंटित किया गया जिसका जीर्णोद्धार कार्य हो चुका है।

कांकेर जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जिला पुरातत्व संघ, कांकेर में भी संग्रहालय खोला जाना प्रस्तावित है संग्रहालय हेतु पुराना कलेक्टर भवन आबंटित किया जा चुका है। भवन का आवश्यक मरम्मत कार्य कराये जाने के बाद प्रतिमा संग्रह तथा प्रदर्शन कार्य किया जाना प्रस्तावित है।

सरगुजा जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जिला पुरातत्व संघ, सरगुजा को संग्रहालय निर्माण हेतु कलेक्टर सरगुजा द्वारा नमनाकला क्षेत्र में एक एकड़ जमीन संग्रहालय हेतु आबंटित की है।

अंबिकापुर जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय
 
महासमुंद जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जिला पुरातत्व संघ, महासमुंद को सिरपुर में संग्रहालय निर्माण हेतु 15 लाख रूपये आबंटित किये गये हैं। कलेक्टर एवं अनुभाग अधिकारी, महासमुंद से सिरपुर में संग्रहालय निर्माण हेतु चर्चा की गई तथा भूमि आबंटन हेतु पत्र भी लिखा गया है।

दुर्ग जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जिला पुरातत्व संघ दुर्ग, द्वारा संचालित तहसील बालोद में बूढ़ा तालाब के समीप स्थापित संग्रहालय हेतु पूर्व में अनुदान दिया जा चुका है। वहां खुले संग्रहालय के रूप में प्रतिमायें प्रदर्शित की गयी है।

चांपा-जांजगीर जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जांजगीर-चांपा छत्तीसगढ़ का जिला मुखयालय है। यह जांजगीर एवं चांपा दो युगल नगरों वाला जिला है जिसे हसदेव नदी विभाजित करती है। राजधानी रायपुर से लगभग 195 कि.मी. तथा बिलासपुर से लगभग 75 कि.मी. दूर अवस्थित है।यहां का निकटतम रेल्वे स्टेशन चांपा है।
जिला पुरातत्व संग्रहालय के लिए भूमि जिला प्रशासन द्वारा नये कलेक्टोरेट के पास आबंटित की गई है एवं उस पर वर्तमान में संग्रहालय भवन निर्माणाधीन है जो जांजगीर शहर से लगभग 3 कि.मी. की दूरी पर जांजगीर-चांपा सड़क से संग्रहालय लगभग 1 कि.मी. पर स्थित है।

रायपुर जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय

जिला पुरातत्व संघ, रायपुर को दिये गये अनुदान राशि से आरंग में निर्मित संग्रहालय भवन वर्तमान में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग का कब्जा है, जबकि उसमें प्रदर्शन कार्य करके संग्रहालय खोलना प्रस्तावित है।